Romance प्रेम तपस्या ( रहस्य और रोमांच से ओत प्रोत एक अविस्वशनीय, अनोखी प्रेम कथा )

anandsngh12

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प्रेम तपस्या
( रहस्य और रोमांच से ओत प्रोत एक अविस्वशनीय, अनोखी प्रेम कथा )



बहुत ही खूबसूरत एहसास है किसी के प्यार में खो जाना। एक तरफ हरे हरे पत्तों की बंदनवार से सजी, लहराती, घुमावदार सड़कें तो दूसरी ओर गहरी खायी से जल कलरव का गूंजता कोलाहल एक बार को दिल कंपा ही देता है। पथरीले पहाड़ों का सीना फाड़ कर मुस्कुराते फूलों के झुंड जब सरसराती हवा से लहलहाते हैं तो ऐसा लगता है की जैसे वह पर्यटकों के स्वागत में संगीत की धुन पर थिरक रहे हों। उस पर अचानक बादलों का भीग कर आसमान पर छा जाना और अपने ही स्याह टुकड़ों पर रीझ कर बरस पड़ना, केवल तन ही नहीं भिगोता, बल्कि आत्मा को भी तृप्त कर जाता है।

दूर दूर तक फैले चाय के सीढ़ीनुमा बागान स्वतः ही अपनी ओर खींच लेते हैं। जगह जगह खेतों से चाय की हरी पत्तियों को टोकरी में जमा करती पहाड़ी औरतों का अपना एक अलग ही आकर्षण है। अपने काम में तल्लीन औरतों का समूह अपनी प्रादेशिक भाषा में कोई लोकगीत जाती हुयी दिखाई पड़ती हैं, जिसकी भाषा तो पूरी तरह समझ में नहीं आती लेकिन हाँ, उनके भाव, उनकी एकरूपता, उस मिठास की खुशबू, दूर दूर तक फैल जाती है।

आँगड़ी (पहाड़ी औरतों का पारम्परिक पहनावा) और घाघरे में लिपटी हुयी औरतें, कान में मुखली, नाक में बुलांक, और हाथो में खडुए पहने, कपड़ों में लदी, सुर्ख कपोलों को अपनी मुस्कान से विस्तार देती गोरी चिट्टी, इन कर्मठ महिलाओं का सौंदर्य देखते ही बनता है जब वह नीचे से आने वाली गाड़ी को टकटकी लगाकर देखती हैं और फिर मुस्कुराकर आपस में कुछ कहती हैं। कितना मासूम, सौम्य और सरल रूप है उनका, जहाँ रत्ती भर भी छल कपट की गुंजाइश नहीं है।

जहाँ एक तरफ ऊंचे-ऊंचे गगनचुम्बी पहाड़ हैं तो दूसरी तरफ दूर तलहटी तक बहता छोटा सा निर्मल झरना, जो नीचे बहती गोमती से मिलने के लिए खुद को तलहटी तक उतार देता है। जिसकी संगीतमयी आवाज़ वहां की शांति को झंकृत करती हुयी देह में एक कम्पन सा छोड़ जाती है। जिसकी सरसराहट इतनी मधुर है की मानों प्रेम के तारों को छेड़ती हुयी बह रही हो। झरने के आस-पास के जल बिंदु अपने होठो से नम्र शिशु घास को चूमते हुए उन्हें अपने प्रेम से अलंकृत कर रहे हों, वहीँ निश्छल, स्वच्छ प्रेम का स्पंदन उनकी हरीतिमा को बढ़ा कर चौगुना कर देता है।

गुलाब, हरश्रृंगार और डेहलिया के फूलों से लदी उस घाटी में स्वर्ग की अनुभूति न हो, ऐसा हो नहीं सकता। पंक्ति बद्ध खड़े बुरास और देवदार के घने वृक्ष उन मीठी हवाओं से सुर-में-सुर मिलाते हुए झूमते हैं और हवा की शीतलता, हवा में घुल कर अठखेलियां करती हैं तो दिल का रोम रोम गुदगुदाने लगता है। गुलाब और केबड़े की मिश्रित सुगंध हौले से नथुनों में घुस जाती है, तब उसकी मधुरता से भीगा हुआ मन झूमने को व्याकुल हो जाता है। ऐसे अद्भुत नज़ारों से होते हुए हौले हौले ऊपर की तरफ सरकना मानों स्वर्ग की तरफ बढ़ने जैसा लगता है।

सुना है की सुबह तड़के ही अमृत बेला में सूर्य चुपके से अपनी लालिमा को बिखेर देता है और उसका, अपने आने का आवाहन शरमाते हुए करना, यहाँ के सबसे खूबसूरत दृश्यों में से एक है। कहते हैं की सूर्य इन्ही पहाड़ो के आँचल से निकल कर ही बड़ा होता है। वह अपना शिशुकाल इसी की गोंद में लुका छिपी खेलता हुआ बिताता है। जब वह इसके आँगन में अपने नन्हे पाँव को धरता है तो सभी दिशाएँ उसे अपनी गोंद में उठाने को अधीर हो उठती हैं और तब वह दौड़ कर उन्ही पहाड़ियों की गोंद में छुप जाता है तो कभी आधा निकल कर, पहाड़ के सीने पर खड़े पेड़ों के झुरमुट से झांकता है। उसका यूं शर्म से लाल हो जाना, समूचे आकाश को अपने रंग में रंग लेता है और फिर मोह पाश में बंधी भोर की किरण ठिठोली करती हुयी कहती है- " अभी कुछ देर और खेल लो सखा " ..मगर वह तो अनुशासन में बंधा है सो कल फिर मिलने का वादा कर के अपनी सुनहरी आभा को छोड़ता ऊपर आसमान में चढ़ जाता है।

ऐसा अनुपम, अकथनीय दृश्य जिसे देखने हज़ारों पर्यटक यहाँ आते हैं ऐसे अप्रतिम नज़ारों को दिल में क़ैद कर वापिस अपनी दुनियां में लौट जाते हैं।

ऐसे ही अद्भुत नज़ारों से भरा पड़ा है कोसानी। कोसानी, अगर इसको पहाड़ों का स्वर्ग कहा जाये तो कोई अतिशंयोक्ति नहीं होगी। वैसे भी इसको भारत का स्विट्ज़रलैंड भी कहा जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ों की गोंद में बसा वह शांत इलाका है जो अपने भीतर बहुत से रत्न छुपाये हुए है।

खूबसूरती और प्रेम कथाओं के लिए दूर दूर तक मशहूर है। इतना तीव्र आकर्षण है वहां के नज़ारों में की, वहां आने वाला अपना दिल उसकी क्षणिक मादकता में ही खो बैठता है। उन वादियों के नशे से शायद ही कोई बच पाया हो। कोई चैलेंज भी करे खुद को फिर भी उससे बाहर निकलना नामुमकिन है। सुध बुध खोया स्वतः ही भीगता जाता है। फिर उसमे तरवतर होकर वह, वह नहीं रहता। वहां की अनवरत चलती शांत और मधुर लहर उसे अपनी आगोश में भर ही लेती है।
 

Rahul

Goodbye
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bahut badhiya suruaat prakirtik khubsurti ko aapne jis tarah dikhaya hai adbhut hai wo is prem ke bagbaan me ab prem kamal khil rahe ek manmohak kahani ke liye sukriya mitra
 

Harsh002

RISTRCTED
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प्रेम तपस्या
( रहस्य और रोमांच से ओत प्रोत एक अविस्वशनीय, अनोखी प्रेम कथा )



बहुत ही खूबसूरत एहसास है किसी के प्यार में खो जाना। एक तरफ हरे हरे पत्तों की बंदनवार से सजी, लहराती, घुमावदार सड़कें तो दूसरी ओर गहरी खायी से जल कलरव का गूंजता कोलाहल एक बार को दिल कंपा ही देता है। पथरीले पहाड़ों का सीना फाड़ कर मुस्कुराते फूलों के झुंड जब सरसराती हवा से लहलहाते हैं तो ऐसा लगता है की जैसे वह पर्यटकों के स्वागत में संगीत की धुन पर थिरक रहे हों। उस पर अचानक बादलों का भीग कर आसमान पर छा जाना और अपने ही स्याह टुकड़ों पर रीझ कर बरस पड़ना, केवल तन ही नहीं भिगोता, बल्कि आत्मा को भी तृप्त कर जाता है।

दूर दूर तक फैले चाय के सीढ़ीनुमा बागान स्वतः ही अपनी ओर खींच लेते हैं। जगह जगह खेतों से चाय की हरी पत्तियों को टोकरी में जमा करती पहाड़ी औरतों का अपना एक अलग ही आकर्षण है। अपने काम में तल्लीन औरतों का समूह अपनी प्रादेशिक भाषा में कोई लोकगीत जाती हुयी दिखाई पड़ती हैं, जिसकी भाषा तो पूरी तरह समझ में नहीं आती लेकिन हाँ, उनके भाव, उनकी एकरूपता, उस मिठास की खुशबू, दूर दूर तक फैल जाती है।

आँगड़ी (पहाड़ी औरतों का पारम्परिक पहनावा) और घाघरे में लिपटी हुयी औरतें, कान में मुखली, नाक में बुलांक, और हाथो में खडुए पहने, कपड़ों में लदी, सुर्ख कपोलों को अपनी मुस्कान से विस्तार देती गोरी चिट्टी, इन कर्मठ महिलाओं का सौंदर्य देखते ही बनता है जब वह नीचे से आने वाली गाड़ी को टकटकी लगाकर देखती हैं और फिर मुस्कुराकर आपस में कुछ कहती हैं। कितना मासूम, सौम्य और सरल रूप है उनका, जहाँ रत्ती भर भी छल कपट की गुंजाइश नहीं है।

जहाँ एक तरफ ऊंचे-ऊंचे गगनचुम्बी पहाड़ हैं तो दूसरी तरफ दूर तलहटी तक बहता छोटा सा निर्मल झरना, जो नीचे बहती गोमती से मिलने के लिए खुद को तलहटी तक उतार देता है। जिसकी संगीतमयी आवाज़ वहां की शांति को झंकृत करती हुयी देह में एक कम्पन सा छोड़ जाती है। जिसकी सरसराहट इतनी मधुर है की मानों प्रेम के तारों को छेड़ती हुयी बह रही हो। झरने के आस-पास के जल बिंदु अपने होठो से नम्र शिशु घास को चूमते हुए उन्हें अपने प्रेम से अलंकृत कर रहे हों, वहीँ निश्छल, स्वच्छ प्रेम का स्पंदन उनकी हरीतिमा को बढ़ा कर चौगुना कर देता है।

गुलाब, हरश्रृंगार और डेहलिया के फूलों से लदी उस घाटी में स्वर्ग की अनुभूति न हो, ऐसा हो नहीं सकता। पंक्ति बद्ध खड़े बुरास और देवदार के घने वृक्ष उन मीठी हवाओं से सुर-में-सुर मिलाते हुए झूमते हैं और हवा की शीतलता, हवा में घुल कर अठखेलियां करती हैं तो दिल का रोम रोम गुदगुदाने लगता है। गुलाब और केबड़े की मिश्रित सुगंध हौले से नथुनों में घुस जाती है, तब उसकी मधुरता से भीगा हुआ मन झूमने को व्याकुल हो जाता है। ऐसे अद्भुत नज़ारों से होते हुए हौले हौले ऊपर की तरफ सरकना मानों स्वर्ग की तरफ बढ़ने जैसा लगता है।

सुना है की सुबह तड़के ही अमृत बेला में सूर्य चुपके से अपनी लालिमा को बिखेर देता है और उसका, अपने आने का आवाहन शरमाते हुए करना, यहाँ के सबसे खूबसूरत दृश्यों में से एक है। कहते हैं की सूर्य इन्ही पहाड़ो के आँचल से निकल कर ही बड़ा होता है। वह अपना शिशुकाल इसी की गोंद में लुका छिपी खेलता हुआ बिताता है। जब वह इसके आँगन में अपने नन्हे पाँव को धरता है तो सभी दिशाएँ उसे अपनी गोंद में उठाने को अधीर हो उठती हैं और तब वह दौड़ कर उन्ही पहाड़ियों की गोंद में छुप जाता है तो कभी आधा निकल कर, पहाड़ के सीने पर खड़े पेड़ों के झुरमुट से झांकता है। उसका यूं शर्म से लाल हो जाना, समूचे आकाश को अपने रंग में रंग लेता है और फिर मोह पाश में बंधी भोर की किरण ठिठोली करती हुयी कहती है- " अभी कुछ देर और खेल लो सखा " ..मगर वह तो अनुशासन में बंधा है सो कल फिर मिलने का वादा कर के अपनी सुनहरी आभा को छोड़ता ऊपर आसमान में चढ़ जाता है।

ऐसा अनुपम, अकथनीय दृश्य जिसे देखने हज़ारों पर्यटक यहाँ आते हैं ऐसे अप्रतिम नज़ारों को दिल में क़ैद कर वापिस अपनी दुनियां में लौट जाते हैं।

ऐसे ही अद्भुत नज़ारों से भरा पड़ा है कोसानी। कोसानी, अगर इसको पहाड़ों का स्वर्ग कहा जाये तो कोई अतिशंयोक्ति नहीं होगी। वैसे भी इसको भारत का स्विट्ज़रलैंड भी कहा जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ों की गोंद में बसा वह शांत इलाका है जो अपने भीतर बहुत से रत्न छुपाये हुए है।

खूबसूरती और प्रेम कथाओं के लिए दूर दूर तक मशहूर है। इतना तीव्र आकर्षण है वहां के नज़ारों में की, वहां आने वाला अपना दिल उसकी क्षणिक मादकता में ही खो बैठता है। उन वादियों के नशे से शायद ही कोई बच पाया हो। कोई चैलेंज भी करे खुद को फिर भी उससे बाहर निकलना नामुमकिन है। सुध बुध खोया स्वतः ही भीगता जाता है। फिर उसमे तरवतर होकर वह, वह नहीं रहता। वहां की अनवरत चलती शांत और मधुर लहर उसे अपनी आगोश में भर ही लेती है।
Aapke lekhan ke prasanshak to hum pahle se hi hai...aur kaaran hai aapke sabdo ka chayan...kitni sunder tarike se varnan kiya hai Koshani ka...aisa hi varnan maine sayad class 10 ki ek kahani mein dekha tha waha bhi koi lekhika issi jagah ke sundarta ka varnan kar rahi thi...uss waqt bhi main kho gaya tha aur abhi ye padh kar bhi khoo gaya...aapke kahaniyon ki yahi to baat hoti hai log khoo se jaate hai usme tabhi to itni fan following hai aapki....
Chaliye ab bas itna hi kahunga...bahut hi sundar aur Manmohak update tha....

Keep writing sir ji
 

Sona

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बहुत ही खूबसूरत एहसास है किसी के प्यार में खो जाना। एक तरफ हरे हरे पत्तों की बंदनवार से सजी, लहराती, घुमावदार सड़कें तो दूसरी ओर गहरी खायी से जल कलरव का गूंजता कोलाहल एक बार को दिल कंपा ही देता है। पथरीले पहाड़ों का सीना फाड़ कर मुस्कुराते फूलों के झुंड जब सरसराती हवा से लहलहाते हैं तो ऐसा लगता है की जैसे वह पर्यटकों के स्वागत में संगीत की धुन पर थिरक रहे हों। उस पर अचानक बादलों का भीग कर आसमान पर छा जाना और अपने ही स्याह टुकड़ों पर रीझ कर बरस पड़ना, केवल तन ही नहीं भिगोता, बल्कि आत्मा को भी तृप्त कर जाता है।

दूर दूर तक फैले चाय के सीढ़ीनुमा बागान स्वतः ही अपनी ओर खींच लेते हैं। जगह जगह खेतों से चाय की हरी पत्तियों को टोकरी में जमा करती पहाड़ी औरतों का अपना एक अलग ही आकर्षण है। अपने काम में तल्लीन औरतों का समूह अपनी प्रादेशिक भाषा में कोई लोकगीत जाती हुयी दिखाई पड़ती हैं, जिसकी भाषा तो पूरी तरह समझ में नहीं आती लेकिन हाँ, उनके भाव, उनकी एकरूपता, उस मिठास की खुशबू, दूर दूर तक फैल जाती है।

आँगड़ी (पहाड़ी औरतों का पारम्परिक पहनावा) और घाघरे में लिपटी हुयी औरतें, कान में मुखली, नाक में बुलांक, और हाथो में खडुए पहने, कपड़ों में लदी, सुर्ख कपोलों को अपनी मुस्कान से विस्तार देती गोरी चिट्टी, इन कर्मठ महिलाओं का सौंदर्य देखते ही बनता है जब वह नीचे से आने वाली गाड़ी को टकटकी लगाकर देखती हैं और फिर मुस्कुराकर आपस में कुछ कहती हैं। कितना मासूम, सौम्य और सरल रूप है उनका, जहाँ रत्ती भर भी छल कपट की गुंजाइश नहीं है।

जहाँ एक तरफ ऊंचे-ऊंचे गगनचुम्बी पहाड़ हैं तो दूसरी तरफ दूर तलहटी तक बहता छोटा सा निर्मल झरना, जो नीचे बहती गोमती से मिलने के लिए खुद को तलहटी तक उतार देता है। जिसकी संगीतमयी आवाज़ वहां की शांति को झंकृत करती हुयी देह में एक कम्पन सा छोड़ जाती है। जिसकी सरसराहट इतनी मधुर है की मानों प्रेम के तारों को छेड़ती हुयी बह रही हो। झरने के आस-पास के जल बिंदु अपने होठो से नम्र शिशु घास को चूमते हुए उन्हें अपने प्रेम से अलंकृत कर रहे हों, वहीँ निश्छल, स्वच्छ प्रेम का स्पंदन उनकी हरीतिमा को बढ़ा कर चौगुना कर देता है।

गुलाब, हरश्रृंगार और डेहलिया के फूलों से लदी उस घाटी में स्वर्ग की अनुभूति न हो, ऐसा हो नहीं सकता। पंक्ति बद्ध खड़े बुरास और देवदार के घने वृक्ष उन मीठी हवाओं से सुर-में-सुर मिलाते हुए झूमते हैं और हवा की शीतलता, हवा में घुल कर अठखेलियां करती हैं तो दिल का रोम रोम गुदगुदाने लगता है। गुलाब और केबड़े की मिश्रित सुगंध हौले से नथुनों में घुस जाती है, तब उसकी मधुरता से भीगा हुआ मन झूमने को व्याकुल हो जाता है। ऐसे अद्भुत नज़ारों से होते हुए हौले हौले ऊपर की तरफ सरकना मानों स्वर्ग की तरफ बढ़ने जैसा लगता है।

सुना है की सुबह तड़के ही अमृत बेला में सूर्य चुपके से अपनी लालिमा को बिखेर देता है और उसका, अपने आने का आवाहन शरमाते हुए करना, यहाँ के सबसे खूबसूरत दृश्यों में से एक है। कहते हैं की सूर्य इन्ही पहाड़ो के आँचल से निकल कर ही बड़ा होता है। वह अपना शिशुकाल इसी की गोंद में लुका छिपी खेलता हुआ बिताता है। जब वह इसके आँगन में अपने नन्हे पाँव को धरता है तो सभी दिशाएँ उसे अपनी गोंद में उठाने को अधीर हो उठती हैं और तब वह दौड़ कर उन्ही पहाड़ियों की गोंद में छुप जाता है तो कभी आधा निकल कर, पहाड़ के सीने पर खड़े पेड़ों के झुरमुट से झांकता है। उसका यूं शर्म से लाल हो जाना, समूचे आकाश को अपने रंग में रंग लेता है और फिर मोह पाश में बंधी भोर की किरण ठिठोली करती हुयी कहती है- " अभी कुछ देर और खेल लो सखा " ..मगर वह तो अनुशासन में बंधा है सो कल फिर मिलने का वादा कर के अपनी सुनहरी आभा को छोड़ता ऊपर आसमान में चढ़ जाता है।

ऐसा अनुपम, अकथनीय दृश्य जिसे देखने हज़ारों पर्यटक यहाँ आते हैं ऐसे अप्रतिम नज़ारों को दिल में क़ैद कर वापिस अपनी दुनियां में लौट जाते हैं।

ऐसे ही अद्भुत नज़ारों से भरा पड़ा है कोसानी। कोसानी, अगर इसको पहाड़ों का स्वर्ग कहा जाये तो कोई अतिशंयोक्ति नहीं होगी। वैसे भी इसको भारत का स्विट्ज़रलैंड भी कहा जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ों की गोंद में बसा वह शांत इलाका है जो अपने भीतर बहुत से रत्न छुपाये हुए है।

खूबसूरती और प्रेम कथाओं के लिए दूर दूर तक मशहूर है। इतना तीव्र आकर्षण है वहां के नज़ारों में की, वहां आने वाला अपना दिल उसकी क्षणिक मादकता में ही खो बैठता है। उन वादियों के नशे से शायद ही कोई बच पाया हो। कोई चैलेंज भी करे खुद को फिर भी उससे बाहर निकलना नामुमकिन है। सुध बुध खोया स्वतः ही भीगता जाता है। फिर उसमे तरवतर होकर वह, वह नहीं रहता। वहां की अनवरत चलती शांत और मधुर लहर उसे अपनी आगोश में भर ही लेती है।
Wonderful starting sir
prakriti ka varnan itni khubsurti se kiya apne ki padhte huye sb feel huya :bow:
Romantic stories meri fav hain jaldi se agla update de do :pray:
Waiting for next :waiting:
 
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