D
Dildar420
Superb story...but agar roman me hoti toh aur maja aata kyuki devnagri aadhi hi samjhe aati hai.
mast update tha bhidu.Update - 31
रात आई और चली गई की तर्ज पर बीती रात घाटी घटना को भुलाकर सभी फिर से नए जोश और जुनून के साथ शादी के जश्न मानने की तैयारी में झूट गए। आज महेंदी का रश्म था। दोनों के हाथों को महेंदी के रंग से रंगा जाना हैं। ताकि महेंदी का रंग दोनों के दांपत्य जीवन को खुशियों से भर दे।
राजेंद्र के पुश्तैनी घर में सभी अपने अपने तैयारी में भगा दौड़ी करने में लगे हुए थें। इन सभी चका चौंध से दूर अपश्यु रूम में अकेला बैठा था। अपश्यु का अपराध बोध उस पर इतना हावी हों चुका था। चाह कर भी अपराध बोध से खुद को मुक्त नहीं करा पा रहा था। सिर्फ अपराध बोध ही नहीं अब तो उसे ये डर भी सता रहा था मां, बडी मां, बहन, भाई, पापा और बड़े पापा का सामना कैसे करे पाएगा। उसके नीच और गिरे हुए कुकर्मों की भनक उन्हें लग गया तो न जानें वो कैसा व्यवहार अपश्यु के साथ करेगें। अपश्यु का मन दो हिस्सों में बाटकर विभिन्न दिशाओं में भटकाकर अलग अलग तर्क दे रहा था। अपश्यु इन्हीं तर्को में उलझकर रह गया।
अपश्यु का एक मन...अरे हो गया गलती अब छोड़ इन बातों को आगे बढ़, दुनियां में बहुत से लोग हैं जो तूझसे भी गिरा हुआ नीच काम करते हैं। वो तो इतना नहीं सोचते। तू क्यों सोच के अथाह सागर में डूब रहा हैं।
दूसरा मन...इससे भी नीच काम ओर क्या हों सकता हैं तूने न जानें कितनो के बहु बेटियो को खिलौना समझकर उनके साथ खेला उनके आबरू को तार तार किया तू दुनिया का सबसे नीच इंसान हैं। तूने दुनिया का सबसे नीच काम किया हैं जारा सोच गहराई से तूने क्या किया हैं।
पहला मन...तूने कोई नीच काम नहीं किया ये तो तेरा स्वभाव हैं। तूने स्वभाव अनुसार ही व्यवहार किया था। इसमें इतना अपराध बोध क्यों करना, तू जैसा हैं बिल्कुल ठीक हैं। तू ऐसे ही रहना। थोड़ा सा भी परिवर्तन खुद में न लाना।
दुसरा मन...तू अपराधी हैं। तुझे अपराध बोध होना ही चाहिए। तूने देखा न कैसे कालू और बबलू के मां बाप नाक रगड़ रगड़ कर माफ़ी मांग रहे थें तू सोच तेरे मां पर किया बीतेगा जब उन्हें पता चलेगा तूने कितना गिरा हुआ हरकत किया था। सोच जब तेरी बहन ये जन पाएगी उसका भाई दूसरे के बहनों के इज्जत को तार तार करने का घिनौना काम किया हैं तब तू किया करेगा , तेरी बडी मां जो तुझे अपने सगे बेटे की तरह प्यार दिया जब उन्हें पाता चलेगा तूने उनके दमन में न जानें कितने दाग लगाया तब तू किया करेगा? सोच जब तेरा दोस्त जैसा भाई जो तेरे एक बार बोलने से तेरा मन चाह काम करता था तेरा किया सभी दोष अपने सिर लेकर डांट सुनता था। उसे पता चलेगा तब किया करेगा। अभी समय हैं जा उन सभी से माफी मांग ले उन्होंने अगर माफ कर दिया तो समझ लेना ऊपर वाले ने भी तुझे माफ कर दिया।
पहला मन…नहीं तू ऐसा बिल्कुल भी मत करना नहीं तो वो माफ करने के जगह तुझे धूतकर देंगे। उनके नज़र में तू एक अच्छा लडका हैं सच बोलते ही तू उनके नजरों में गिर जायेगा। तू दुनिया के नज़र में चाहें जितना भी गिरा हुआ हों उनके नजरों में तू एक अच्छा लडका हैं। इसलिए तेरा चुप रहना ही बेहतर हैं।
दुसरा मन…सोच जारा जब तेरे मां, बाप, बडी मां, बड़े पापा, भाई , बहन दूसरे से जान पाएंगे उनका बेटा भाई कितना गिरा हुआ हैं। तब उन्हें कितना कष्ट पहुंचेगा हों सकता है उन्हें तेरे कारण दूसरे के सामने नाक भी रगड़ना पड़े तब तू किया करेगा उनका अपमान सह पाएगा कल ही कि बात सोच जब उन लड़कों ने तेरे बहन को छेड़ा फिर उनके मां बाप को कितना जलील होना पडा, इतना जलील होते हुए तू अपने मां बाप को देख पाएगा। अगर देख सकता हैं तो ठीक हैं तू चल उस रास्ते पर जिस पर चलने का तेरा दिल चाहें। लेकिन एक बात ध्यान रखना आज मौका मिला हैं सुधार जा नहीं तो हों सकता हैं आगे सुधरने का मौका ही न मिले।
अपश्यु के बांटे हुए दोनों मनो के बिच जंग चल रहा था। तर्क वितर्क का एक लंबा दौर चला फिर अपश्यु का दुसरा मन पहले मन पर हावी हों गया। दूसरे मन की बात मानकर अपश्यु खुद से बोला... मैं सभी को सच बता दुंगा लेकिन आज नहीं आज अगर मैने उन्हे सच बता दिया ददाभाई के शादी के ख़ुशी का रंग जो चढ़ा हुआ है वो फीका पड़ जायेगा मैं शादी के बाद अपना करतूत उन्हे बता दुंगा और उनसे माफ़ी मांग लूंगा। माफ किया तो ठीक नहीं तो कहीं दूर चला जाऊंगा।
अपश्यु खुद में ही विचाराधीन था और उधर अपश्यु को न देख सभी उसे ढूंढ रहे थें। लेकिन उन्हें अपश्यु कहीं मिल ही नहीं रहा था। रघु अपश्यु को ढूंढते हुए सुरभि के पास पहुंचा और बोला...मां अपने अपश्यु को कही देखा हैं न जाने कहा गया कब से ढूंढ रहा हूं।
सुरभि…मैं भी उसे नहीं देखा कुछ जरूरी काम था जो उसे ढूंढ रहा हैं।
रघु…मां जरुरी काम तो कुछ नहीं सभी को देख रहा हूं बस अपश्यु सुबह से अभी तक नहीं दिखा इसलिए पुछ रहा हूं
सुरभि…ठीक है मैं देखती हूं।
सुरभि पूछताछ करते हुए। सुकन्या के पास पहुंचा सुकन्या उस वक्त कुछ महिलाओं के साथ बैठी बातों में मशगूल थीं।
सुरभि...छोटी अपश्यु कहा है उसका कुछ खबर हैं रघु कब से उसे ढूंढ रहा हैं।
सुकन्या... दीदी अपश्यु अपने रूम में हैं न जानें कितना सोता हैं कितनी बार आवाज दिया कोई जवाब नहीं दिया आप जाकर देखो न हों सकता है आप'की बात मान ले।
सुरभि... ठीक हैं मै देखती हूं।
सुरभि सीधा चल दिया अपश्यु के रुम की तरफ रूम पर पहुंचकर देखा दरवाजा बन्द हैं। हल्का सा मुस्कुराकर दरवाज़ा पीटने लग गई। लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला फिर दरवाज़ा दुबारा पीटते हुए बोली…अपश्यु दरवाज़ा खोल, जल्दी खोल बेटा तुझे रघु बुला रहा हैं।
अपश्यु अभी अभी विचारों के जंगल से बाहर निकला था। बडी मां की आवाज़ सुनकर आंखे मलते हुए दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही सुरभि बोली…ये kuyaaa…।
सुरभि पूरा बोल ही नहीं पाई अपश्यु की लाल आंखे देखकर रूक गई फिर अपश्यु बोला…. हा बडी मां बोलों कुछ काम था।
सुरभि... बेटा माना की देर रात तक जागे हों फिर भी इतने देर तक सोना अच्छा नहीं हैं। घर में शादी हैं आए हुए महमानो का अवभागत करना भी जरुरी हैं।
अपश्यु जग तो बहुत पहले गया था। कल घटी घटना के करण खुद में उलझा हुआ था पर ये बात न बताकर अपश्यु बहाना बना दिया।
अपश्यु... बडी मां देर रात तक जगा था तो आंख ही नहीं खुला अब किया करता।
सुरभि…अब जाओ जल्दी से तैयार होकर नीचे आजा रघु तुझे ढूंढ रहा हैं।
अपश्यु…दादा भाई ढूंढ रहे हैं चलो पहले उनसे ही मिल लेता हूं।
इतना कहकर अपश्यु बाहर को जानें लगा तभी सुरभि रोकते हुए बोली...जा पहले नहा धोकर अच्छा बच्चा बनकर आ भूत लग रहा हैं कहीं किसी मेहमान ने देख लिया तो भूत भूत चिलाते हुए भाग न जाए।
सुरभि की बाते सुनकर अपश्यु मुस्करा दिया। सुरभि अपश्यु के बिखरे बालो पर हाथ फेरकर बाहर चली गई। बड़ी मां के जाते ही अपश्यु बाथरूम में घुस गया। कुछ क्षण में बाथरूम से निकलकर टिप टॉप तैयार होकर नीचे आ गया। पहले रघु से मिला फ़िर इधर उधर के कामों को करने में लग गया।
ऐसे ही पल पल गिनते गिनते शाम हों गया। शाम को मेंहदी रस्म के चलते महिलाओं का तांता लगा गया। एक ओर महिलाएं अपने नाच गाने में लगे रहे। एक ओर मेंहदी रचाने वाले अपने अपने काम में लग गए। कोई रघु के हाथ में मेहंदी लगा रहें थे तो कोई सुकन्या, सुरभि पुष्पा के हाथों में मेंहदी लगाने में लग गए। अपश्यु और रमन दोनों एक साईड में खड़े देख रहे थें। दोनों को देखकर सुरभि बोली…अपश्यु रमन तुम दोनों मेहंदी नहीं लगवा रहें हों। तुम दोनों भी लगवा लो भाई और दोस्त की शादी हैं तुम दोनों को तो खुद से आगे आकर लगवाना चाइए था।
रमन... रानी मां शादी रघु की है हम क्यों मेहंदी लगवाए वैसे भी मेंहदी हम लड़कों के लिए नहीं लड़कियों और औरतों के लिए हैं ।
अपश्यु…. हां बडी मां मुझे नहीं लगवाना मेंहदी, मेंहदी लड़कों के हाथ में नहीं लड़कियों के हाथ में शोभा देती हैं ।
सुरभि…मेंहदी सिर्फ श्रृंगार के लिए नहीं लगाया जाता हैं। कहा जाता हैं मेंहदी का रंग जीवन में खुशियों का रंग भर देता हैं। इसलिए शादी जैसे मौके पर सभी मेंहदी लगवा सकता हैं। तुम दोनों भी लगवा लो जिससे जल्दी ही तुम्हारे जीवन में भी रंग भरने वाली कोई आ जाए।
इतना कहकर सुरभि हंस देती हैं। पुष्पा आंखे दिखाते हुए बोली...चलो आप दोनों भी मेंहदी लगवा लो नहीं तो सोच लो मेरा कहना न मानने पर आप दोनों का किया होगा।
दोनों मन ही मन बोले इतने लोगों के बीच कान पकड़ने से अच्छा मेंहदी लगवाना लेना ही ठीक रहेगा। इसलिए दोनों चुप चाप मेंहदी लगवाने बैठ गए।
उधर महेश के घर पर भी मेंहदी का रश्म शुरू हों गया। कमला को बीच में बिठाकर चारों और से कुछ महिलाएं घेरे हुए नाच गाना करने में लगी रहीं। मेंहदी रचाने वाली लड़कियां कोई कमला के हाथों और पांव में मेंहदी लगने लग गए। कमला के साथ उसकी दोनों सहेलियां बैठी बातों में मशगूल थीं
चंचल...कमला मेहंदी तो तूने पहले भी कई बार रचाया हैं आज सैयां के नाम की मेहंदी रचते हुए कैसा लग रहा हैं ।
शालू…मन में लड्डू फुट रहा होगा। बता न कमला किसी के नाम की मेहंदी जब हाथ में रचती हैं तब कैसा लगता हैं।
कमला... मैं क्यों बताऊं जब तुम दोनों के हाथ में किसी के नाम की मेहंदी रची जाएगी तब खुद ही जान जाओगे अब तुम दोनों चुप चाप मेहंदी लगवाने दो।
चंचल….मेहंदी कौन सा तेरे मुंह पर लग रही हैं जो तू हमसे बात नहीं कर सकती।
शालू...अरे शालू तू नहीं समझ रहीं हैं हमारी सखी अब हमारी नहीं रहीं सजन की हों चुकी हैं। वो भला हमसे बात क्यों करेंगी।
कमला…तुम दोनों को चुप करना हैं कि नहीं या पीट कर ही मानोगे।
चंचल...कमला तू बहुत याद आयेगी रे शादी के बाद तू हमें भुल तो नहीं जाएगी बोल न।
कमला…नही रे मैं तुम दोनों को कैसे भुल सकती हूं तुम दोनों तो मेरे सबसे प्यारी….।
कमला अधूरा बोलकर रूक गई और आंखो से नीर बहा दिया। आंखे नम शालू और चंचल की भी हों गईं। आखिर इतनों वर्षो का साथ जो छुटने वाला था। दोनों ने बहते आंसू को पोंछकर कमला के आंसू भी पोछ दिया फिर चंचल बोली...तू भूलना भी चाहेगी तो हम तुझे बोलने नहीं देंगे।
शालू...और नहीं तो क्या हम तुझे पल पल याद दिलाते रहेंगे।
इन तीनों की हसी ठिठौली फिर शुरू हों गई । लेकिन मनोरमा बेटी को मेहंदी लगते देखकर खुद को ओर न रोक पाई इसलिए एक कोने में जाकर अंचल में मुंह छुपाए रोने लग गई। महेश के नजरों से मनोरमा खुद को न छुप पाई। मनोरमा को कोने में मुंह छुपाए रोते देखकर महेश पास गया फिर बोला…मनोरमा इस ख़ुशी के मौके पर यूं आंसू बहाकर गम में न बदलो देखो हमारी बेटी कितनी खुश दिख रही हैं।
मनोरमा...कैसे न रोऊं जिन हाथों से लालन पालन कर बेटी को बडा किया एक दिन बाद उसी हाथ से बेटी को विदा करना हैं। ये सोचकर किस मां के आंख न छलके आप ही बताओं।
मनोरमा की बात सुनकर महेश के भी आंखे नम हों गया। दोनों एक दुसरे को समझाने में लग गए। कमला की नज़रे मां बाप को ढूंढ रही थीं। कमला के हाथों और पैरों में मेहंदी रचा जा चुका था। मां को दिखाकर पूछना चाहती थी मेहंदी कैसी रची हैं। ढूंढते हुए उसे मां बाप एक कोने में खड़ा दिखा। कमला उठकर उनके पास गई। फिर बोली...मां देखो तो मेरे हाथ में रची मेहंदी कैसी दिख रही हैं।
मनोरमा एक नज़र कमला के हाथ को देखा फिर कमला से लिपटकर रोने लग गई। कमला भी खुद को ओर न रोक पाई, फुट फुट कर रो दिया। दोनों कुछ क्षण तक रोते रहे फिर महेश के कहने पर दोनों अलग हुए। कमला मां को साथ लेकर गई फिर खुद पसंद करके मां के हाथों में मेहंदी रचवाया।
कुछ देर तक और मेहंदी रचने का काम चलता रहा। महिलाओं का नाच गाना भी संग संग चलता रहा। नाच गा कर जब सभी थक गए तब मेहंदी रस्म को विराम दे दिया गया।
अगले दिन शादी था तो जहा लङकी वाले बारातियों के स्वागत सत्कार की तैयारी में जुट गए वही लडके वाले बारात ले जानें की तैयारी में जुट गए। उधर संकट इस बात से परेशान था। उसे अभी तक मौका नहीं मिला था। दल बल के साथ खड़े होकर इसी पर विचार कर रहा था।
संकट...यार क्या करूं समझ ही नहीं आ रहा। कोई मौका भी नहीं बन रहा अभी अपश्यु का कुछ नहीं किया तो न जानें फ़िर कब मौका मिलेगा।
विंकट...अरे उस्ताद कोई न कोई मौका बन ही जायेगा मुझे लगता है शादी के एक दो दिन बाद ही मौका मिल जायेगा।
"अरे शादी के बाद नहीं हमे आज ही कुछ करना होगा इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा।"
"हा मौका तो अच्छा हैं लेकिन अपश्यु अकेले मिलना भी तो चाहिए ऊपर से ये ठुल्ले मामू लोगों ने अलग ही जमघट लगा रखा हैं।"
"अरे यार बड़े घर की शादी है तो पुलिस तो आयेंगे ही। यार संकट तू कुछ बता हमारा दिमाग तो काम ही नहीं कर रहा हैं।"
संकट सोच की मुद्रा में आ गया। आगे कैसे क्या किया जाए बिना पुलिस के नज़र में आए। संकट सोचने में गुम था तभी विंकट बोला... मेरे दिमाग में एक योजना है कहो तो सुनाऊं।
सभी विंकट का मुंह ताकने लग गए कुछ क्षण तक ताका झाकी करने के बाद संकट बोला…सुनता क्यों नही अब सुनने के लिए भी मूहर्त निकलबाएगा।
विंकट...उस्ताद क्यों न आप बरती बनकर बारात में सामिल हों जाओ फिर रात में सभी शादी में मगन होंगे तब कोई जाकर बहाने से अपश्यु को बुलाकर ले आना फिर किसी सुनसान जगह ले जा'कर अपना अपना भड़ास निकाल लेना।
संकट…हां ये ठीक रहेगा हम सभी बारात में बाराती बनकर चलते हैं। लडकी वालो के वहा पहुचकर कोई सुनसान जगह देखकर अपश्यु को बुलाकर लायेंगे फिर जमकर धोएंगे।
सभी संकट के बात से सहमत हों गए फिर सभी बारात में जानें की तैयारी करने चल दिए। इधर राजेंद्र के पुश्तैनी घर पर भी बरात लेकर जानें की तैयारी शुरू हों गया। सभी मेहमान भी आ चुके थे सहनाई की मधुर धुन बज रहा था। एक कमरे में रघु को तैयार किया जा रहा था। रघु को कुछ क्षण में तैयार कर दिया गया। रघु के ललाट से गाल तक चंदन के छोटे छोटे टिके लगाया गया था। पहनावे में धोती कुर्ता सिर पर सफेद शंकुआकार का टूपूर था (बंगाली समझ का ये एक पारंपरिक लिबाज है जो शादी के वक्त दूल्हे को पहनाया जाता है।)
दूल्हा रघु तैयार था तो कुछ रस्में थी जो निभाया जाना था उसे निभाने के लिए सुरभि सुकन्या रघु के कमरे में गई। रघु को सजा धजा देखकर सुकन्या रघु के पास गई फ़िर उसके कान के पास एक टीका लगा दिया। उसके बाद जो रस्में थी उसे निभाया गया। रश्म पूरा होते ही रघु को बहार लाया गया। कुछ वक्त नाच गाना हुआ। नाच गाना चलाता रहेगा किंतु बरात को समय से दूल्हा का पहुंचना जरुरी था इसलिए बरात प्रस्थान कर दिया गया। सभी बराती रघु के पीछे हों लिए भीड़ में संकट गैंग के साथ सामिल हों गया।
नाचते गाते सभी आ पहुंचे महेश के घर महेश के घर की रौनक ही अलग था। बेहतर तरीके से सजावट किया गया था। तरह तरह की लाइटों से पुरा घर चमक रहा था। गेट पर रघु को रोका गया जहां मनोरमा आकर रघु का टीका कर अन्दर आने की अनुमति दे गई। रघु की कोई साली नहीं था तो कमला की दोनों सहेली ने गेट पर ही साली होने का दायित्व निभाया शालू ने रघु का एक पैर धुलवाया फिर बोली…जीजा जी अब नग दीजिए तब दूसरा पैर धुलेगा।
रमन और अपश्यु, रघु के अगल बगल खड़े थे। अपश्यु शालू और चंचल के साथ तर्क वितर्क में उलझा रहा लेकिन रमन का उससे कोई मतलब नहीं था, सजी साबरी शालू अदभुत सुंदरी लग रही थीं। रमन बस शालू को देखने में खोया रहा। मन ही मन अलग ही सपने बुनता रहा। चंचल ने एक नज़र रमन को देखा फिर शालू के कान में कहा...शालू देख तूझे कैसे देख रहा हैं। लगता है तुझ पर फिदा हों गया।
शालू रमन की ओर देखा फिर नजरे झुका लिया। इनके क्रिया कलाप पर अपश्यु की नज़र पड़ गया। रमन को खोया देखकर रमन को हिलाया फिर बोला... किया देख रहे हों रमन भईया कोई खजाना दिख गया।
अपश्यु के बोलते ही रमन भूतल पर आया, नज़रे चुराने की तर्ज पर इधर उधर देखने लग गया। ये देख अपश्यू शालू और चंचल मुस्कुरा दिए। कुछ क्षण तक दोनों पक्षों में लेन देन को लेकर वाद विवाद चलता रहा। रमन वाद विवाद करने के दौरान बीच बीच में शालू की और देखकर ही बात करता रहा। जब दोनों की नज़रे आपस में टकरा जाती तो तुरत ही नजरे हटाकर इधर उधर देखने लग जाते। दोनों को पहली नज़र के चुंबकीय शक्ति ने आकर्षित कर लिया दोनों एक दूसरे को देख रहे थें लेकिन एक दूसरे से नज़रे बचाकर। बरहाल लेने देन का मशला सुलझा फिर रघु के दूसरे पैर को धुलवाया गया। मुंह मीठा करने के बाद रघु को अन्दर ले जाया गया।
संकट और उसके गैंग ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया। उन्हे एक खाली जगह चाहिए था तो उसे ही ढूंढने लग गए। वो भी मिल गया लेकिन खाली जगह महेश के घर से थोड़ा दूर था। वहा तक अपश्यु को लाने के लिए सभी एक योजना बनाकर अन्दर आ गए। मौका मिलते ही किसी बहाने से अपश्यु को बुलाकर बहार ले जाएंगे। लेकिन उन्हें एक डर ये भी लग रहा था महेश के घर में पुलिस की संख्या ज्यादा था कहीं वो पुलिस के नज़र में न आ जाएं।
इधर मंडप में आने के बाद रघु को एक सोफे पर बैठा दिया गया रघु के अगल बगल रमन अपश्यु और पुष्पा बैठ गए। रमन इधर उधर नज़रे घुमा किसी को ढूंढने लगा, अनगिनत चेहरे दिख रहा हैं पर जिस चेहरे की उसे तलाश हैं वो नहीं दिख रहा। यूं इधर उधर रमन का मुंडी हिलाना पुष्पा को दिख गया तो पुष्पा बोली... रमन भईया इधर उधर किया देख रहे हों कुछ चाहिए था।
रमन झेपकर बोला... नही नही कुछ नहीं चाहिए।
अपश्यु…मैं जनता हूं रमन भईया को किया चाहिए बता दूं रमन भईया।
रमन...नहीं अपश्यु! कुछ न बताना, बता दिया तो देख लेना अच्छा नहीं होगा।
पुष्पा...umhuuu किया छुपा रहे हों। जल्दी बताओं।
रघु... हा रमन बता न बात किया बात हैं।
रमन टाला मटोली करने में लगा रहा। इतना पुछने पर भी जब रमन नहीं बताया तो अपश्यु ने रघु के कान में कुछ बोला, सुनकर रघु मुस्कुराया फ़िर बोला...क्या यार इतनी सी बात बोलने में शर्मा रहा हैं रूक अभी मैं किसी को बुलाता हूं।
रघु ने आस पास घूम रहे वेटर में से एक को बुलाया फिर रमन को दिखाते हुए बोला…इसे फ्रेश होने जाना हैं। क्या आप इसको ले'कर जा सकते हों।
रमन…मैंने कब कहा मुझे बाथरूम जाना हैं।
अपश्यु मुंह पर हाथ रखकर हंसते हुए वेटर को जानें को कहा फिर एक बार रघु के कान में कुछ कहा तब रघु बोला... क्यों रे रमन मेरी शादी करवाने आया या अपनी वाली ढूंढने आया बता।
रमन…अपश्यु तूझे माना कर था न फ़िर क्यों बताया।
रमन अपश्यु और रघु हल्की हल्की आवाज में बात कर रहे थें। तो पुष्पा को न कुछ सुनाई दे रहा था न ही कुछ समझ आ रहा था इसलिए पुष्पा बोली...आप तीनों में क्या खिचड़ी पक रहा हैं मुझे बातों नहीं तो सोच लो खिचड़ी खाने लायक नहीं रहेगा।
अपश्यु...पुष्पा मैं बताता हूं फिर अपश्यु ने शालू और रमन के बीच के नैन मटका वाला किस्सा सुना दिया। सुनकर पुष्पा बोली... तो ये बात हैं। वैसे रमन भईया आप'को लड़की पसन्द है तो इस मामले में भाभी ही कुछ मदद कर सकती हैं आप'को उनसे ही मदद मांगना चाहिए।
इसके बाद तो तीनों मिलकर रमन को छेड़ने लग गए। कुछ वक्त तक इनका रमन को छेड़ना चलता रहा। पुरोहित जी आए आते ही मंडप में सभी तैयारी कर लिया फिर उन्होंने रघु को मंडप में आने को कहा। रघु हाथ मुंह धोकर मंडप में बैठ गया। कुछ देर बाद पुरोहित ने कहा कन्या को बुलाया जाए। कुछ क्षण में कमला घूंघट उड़े दुल्हन के लिवास में शालू और चंचल के साथ सीढ़ी से धीरे धीर चलकर आने लगीं। दुल्हन के लिवास में कमला को देखकर कमला के चेहरे को देखने के लिए रघु तरसने लगा बस जतन कर रहा था किसी तरह कमला का चेहरा दिख जाएं पर ऐसा कुछ हुआ ही नहीं क्योंकि कमला का चेहरा अच्छे से ढका हुआ था। अब तो चेहरे पर लगा पर्दा शूभोदृष्टि की रश्म करते वक्त ही दिखाई देगा।
रमन एक टक शालू को देखने में लगा रहा आस पास किया हों रहा हैं। कौन क्या कह रहा हैं उससे कुछ लेना देना नहीं था। किसी से कुछ वास्ता हैं तो सिर्फ और सिर्फ शालू है। बीच बीच में शालू भी रमन की और देख लिया करती, जैसे ही दोनों की नज़रे आपस में मिल जाता। शालू नज़रे झुकाकर मंद मंद मुस्कुरा देती। रमन और शालू का नैन मटका करना पुष्पा के नज़र में आ गया। तो रमन को कोहनी मरकर धीरे से कान में बोली... भईया क्या कर रहे हों थोड़ा कम देखो नहीं तो लड़की आप'को छिछोरा समझ बैठेगी।
रमन झेपकर नज़रे नीचे कर लिया। दुल्हन कमला मण्डप में पहूंच गई कमला के मंडप में बैठते ही शादी की विधि शुरू हों गया। राजेंद्र ये देख खुशी के आंसु बहने लग गया। कितनी कोशिशों के बाद आज उसे ये दिन देखना नसीब हो रहा था। रावण मन ही मन खुद को गाली दिया। इतना यतन करने के बाद भी जो नहीं चाहता था वो आज उसके आंखो के सामने हों रहा था।
खैर कुछ क्षण बाद पूतोहित जी के कहने पर महेश मंडप में पधारे रघु और कमला का गठबन्धन कर कमला का हाथ रघु को सौफकर कन्या दान का रश्म भीगे नैनों से पूर्ण किया। रश्म के दौरान कमला के नैन अविरल बह चली मानो कमला के नैनों ने बहुत समय से बंधकर रखी हुई समुंदर के बांध को हमेशा हमेशा के लिए खोल दिया हों।
कन्या दान के रश्म के बाद उसे बाप का घर छोड़कर एक नए घर में जाकर वहा के रीति रिवाज के अनुसार चलना हैं। जितनी आजादी बाप के घर में मिला करती थीं शायद ससुराल में वो आजादी छीन ली जाए और चार दिवारी में कैद कर लिया जाएं। जिस तरह ससुराल पक्ष चाहेगा वैसे ही कमला को आचरण करना हैं। एक नया रिश्ता निभाना हैं। मां बाप के साथ साथ सास ससुर के मान इज्जत का ख्याल रखना हैं। नए सिरे से सभी के साथ अपनेपन का रिश्ता जोड़ना हैं। एक नवजात शिशु की तरह एक बार फ़िर से जीवन यात्रा शुरू करना हैं। इस यात्रा में उसका साथी मां बाप नहीं बल्कि पति, सास, ससुर उनका परिवार होगा।
इधर कन्या दान का रश्म चल रहा था उधर संकट के भेजे एक आदमी ने आकर अपश्यु से कहा...साहब आप'को कोई बहार बुला रहा हैं।
अपश्यु... कौन है? मैं तो यह के किसी को नहीं जनता।
"साहब वो तो मैं नहीं जनता लेकिन वो कह रहें थें आप उनके घनिष्ट मित्र हैं।"
घनिष्ट मित्र की बात सुनकर अपश्यु उठाकर उसके साथ चल दिया। अपश्यु को लगा शायद दार्जलिंग से उसका कोई दोस्त आया होगा।
आज के लिए इतना ही आगे की कहानी अगले अपडेट से जानेंगे। यहां तक साथ बने रहने के लिए अभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद
Wonderful update . apsyu is dubhida me fansa tha ke wo parivaar ko apne kiye gaye gunaho ke bare bataye ki nahi. man ki awaaz ne esa karne se mana kar rahi thi use. par dil ki awaaz ne use sahi rasta dikhaya. par sayad batane me deri ho jaye ab kyuki sankat ka admi use saza dene ke liye kisi viran jagah pe le gaya tha, jaha sankat apne admiyo ke sath intejer kar rah tha . ek taraf khushi ka mahol, raghu aur kamla ki shadi ho rahi hai aur dusri taraf apsyu ke sath bahut bura hone wala hai. ese kisike kehne se hi apsyu ko nahi jana chahiye tha.Update - 31
रात आई और चली गई की तर्ज पर बीती रात घाटी घटना को भुलाकर सभी फिर से नए जोश और जुनून के साथ शादी के जश्न मानने की तैयारी में झूट गए। आज महेंदी का रश्म था। दोनों के हाथों को महेंदी के रंग से रंगा जाना हैं। ताकि महेंदी का रंग दोनों के दांपत्य जीवन को खुशियों से भर दे।
राजेंद्र के पुश्तैनी घर में सभी अपने अपने तैयारी में भगा दौड़ी करने में लगे हुए थें। इन सभी चका चौंध से दूर अपश्यु रूम में अकेला बैठा था। अपश्यु का अपराध बोध उस पर इतना हावी हों चुका था। चाह कर भी अपराध बोध से खुद को मुक्त नहीं करा पा रहा था। सिर्फ अपराध बोध ही नहीं अब तो उसे ये डर भी सता रहा था मां, बडी मां, बहन, भाई, पापा और बड़े पापा का सामना कैसे करे पाएगा। उसके नीच और गिरे हुए कुकर्मों की भनक उन्हें लग गया तो न जानें वो कैसा व्यवहार अपश्यु के साथ करेगें। अपश्यु का मन दो हिस्सों में बाटकर विभिन्न दिशाओं में भटकाकर अलग अलग तर्क दे रहा था। अपश्यु इन्हीं तर्को में उलझकर रह गया।
अपश्यु का एक मन...अरे हो गया गलती अब छोड़ इन बातों को आगे बढ़, दुनियां में बहुत से लोग हैं जो तूझसे भी गिरा हुआ नीच काम करते हैं। वो तो इतना नहीं सोचते। तू क्यों सोच के अथाह सागर में डूब रहा हैं।
दूसरा मन...इससे भी नीच काम ओर क्या हों सकता हैं तूने न जानें कितनो के बहु बेटियो को खिलौना समझकर उनके साथ खेला उनके आबरू को तार तार किया तू दुनिया का सबसे नीच इंसान हैं। तूने दुनिया का सबसे नीच काम किया हैं जारा सोच गहराई से तूने क्या किया हैं।
पहला मन...तूने कोई नीच काम नहीं किया ये तो तेरा स्वभाव हैं। तूने स्वभाव अनुसार ही व्यवहार किया था। इसमें इतना अपराध बोध क्यों करना, तू जैसा हैं बिल्कुल ठीक हैं। तू ऐसे ही रहना। थोड़ा सा भी परिवर्तन खुद में न लाना।
दुसरा मन...तू अपराधी हैं। तुझे अपराध बोध होना ही चाहिए। तूने देखा न कैसे कालू और बबलू के मां बाप नाक रगड़ रगड़ कर माफ़ी मांग रहे थें तू सोच तेरे मां पर किया बीतेगा जब उन्हें पता चलेगा तूने कितना गिरा हुआ हरकत किया था। सोच जब तेरी बहन ये जन पाएगी उसका भाई दूसरे के बहनों के इज्जत को तार तार करने का घिनौना काम किया हैं तब तू किया करेगा , तेरी बडी मां जो तुझे अपने सगे बेटे की तरह प्यार दिया जब उन्हें पाता चलेगा तूने उनके दमन में न जानें कितने दाग लगाया तब तू किया करेगा? सोच जब तेरा दोस्त जैसा भाई जो तेरे एक बार बोलने से तेरा मन चाह काम करता था तेरा किया सभी दोष अपने सिर लेकर डांट सुनता था। उसे पता चलेगा तब किया करेगा। अभी समय हैं जा उन सभी से माफी मांग ले उन्होंने अगर माफ कर दिया तो समझ लेना ऊपर वाले ने भी तुझे माफ कर दिया।
पहला मन…नहीं तू ऐसा बिल्कुल भी मत करना नहीं तो वो माफ करने के जगह तुझे धूतकर देंगे। उनके नज़र में तू एक अच्छा लडका हैं सच बोलते ही तू उनके नजरों में गिर जायेगा। तू दुनिया के नज़र में चाहें जितना भी गिरा हुआ हों उनके नजरों में तू एक अच्छा लडका हैं। इसलिए तेरा चुप रहना ही बेहतर हैं।
दुसरा मन…सोच जारा जब तेरे मां, बाप, बडी मां, बड़े पापा, भाई , बहन दूसरे से जान पाएंगे उनका बेटा भाई कितना गिरा हुआ हैं। तब उन्हें कितना कष्ट पहुंचेगा हों सकता है उन्हें तेरे कारण दूसरे के सामने नाक भी रगड़ना पड़े तब तू किया करेगा उनका अपमान सह पाएगा कल ही कि बात सोच जब उन लड़कों ने तेरे बहन को छेड़ा फिर उनके मां बाप को कितना जलील होना पडा, इतना जलील होते हुए तू अपने मां बाप को देख पाएगा। अगर देख सकता हैं तो ठीक हैं तू चल उस रास्ते पर जिस पर चलने का तेरा दिल चाहें। लेकिन एक बात ध्यान रखना आज मौका मिला हैं सुधार जा नहीं तो हों सकता हैं आगे सुधरने का मौका ही न मिले।
अपश्यु के बांटे हुए दोनों मनो के बिच जंग चल रहा था। तर्क वितर्क का एक लंबा दौर चला फिर अपश्यु का दुसरा मन पहले मन पर हावी हों गया। दूसरे मन की बात मानकर अपश्यु खुद से बोला... मैं सभी को सच बता दुंगा लेकिन आज नहीं आज अगर मैने उन्हे सच बता दिया ददाभाई के शादी के ख़ुशी का रंग जो चढ़ा हुआ है वो फीका पड़ जायेगा मैं शादी के बाद अपना करतूत उन्हे बता दुंगा और उनसे माफ़ी मांग लूंगा। माफ किया तो ठीक नहीं तो कहीं दूर चला जाऊंगा।
अपश्यु खुद में ही विचाराधीन था और उधर अपश्यु को न देख सभी उसे ढूंढ रहे थें। लेकिन उन्हें अपश्यु कहीं मिल ही नहीं रहा था। रघु अपश्यु को ढूंढते हुए सुरभि के पास पहुंचा और बोला...मां अपने अपश्यु को कही देखा हैं न जाने कहा गया कब से ढूंढ रहा हूं।
सुरभि…मैं भी उसे नहीं देखा कुछ जरूरी काम था जो उसे ढूंढ रहा हैं।
रघु…मां जरुरी काम तो कुछ नहीं सभी को देख रहा हूं बस अपश्यु सुबह से अभी तक नहीं दिखा इसलिए पुछ रहा हूं
सुरभि…ठीक है मैं देखती हूं।
सुरभि पूछताछ करते हुए। सुकन्या के पास पहुंचा सुकन्या उस वक्त कुछ महिलाओं के साथ बैठी बातों में मशगूल थीं।
सुरभि...छोटी अपश्यु कहा है उसका कुछ खबर हैं रघु कब से उसे ढूंढ रहा हैं।
सुकन्या... दीदी अपश्यु अपने रूम में हैं न जानें कितना सोता हैं कितनी बार आवाज दिया कोई जवाब नहीं दिया आप जाकर देखो न हों सकता है आप'की बात मान ले।
सुरभि... ठीक हैं मै देखती हूं।
सुरभि सीधा चल दिया अपश्यु के रुम की तरफ रूम पर पहुंचकर देखा दरवाजा बन्द हैं। हल्का सा मुस्कुराकर दरवाज़ा पीटने लग गई। लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला फिर दरवाज़ा दुबारा पीटते हुए बोली…अपश्यु दरवाज़ा खोल, जल्दी खोल बेटा तुझे रघु बुला रहा हैं।
अपश्यु अभी अभी विचारों के जंगल से बाहर निकला था। बडी मां की आवाज़ सुनकर आंखे मलते हुए दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही सुरभि बोली…ये kuyaaa…।
सुरभि पूरा बोल ही नहीं पाई अपश्यु की लाल आंखे देखकर रूक गई फिर अपश्यु बोला…. हा बडी मां बोलों कुछ काम था।
सुरभि... बेटा माना की देर रात तक जागे हों फिर भी इतने देर तक सोना अच्छा नहीं हैं। घर में शादी हैं आए हुए महमानो का अवभागत करना भी जरुरी हैं।
अपश्यु जग तो बहुत पहले गया था। कल घटी घटना के करण खुद में उलझा हुआ था पर ये बात न बताकर अपश्यु बहाना बना दिया।
अपश्यु... बडी मां देर रात तक जगा था तो आंख ही नहीं खुला अब किया करता।
सुरभि…अब जाओ जल्दी से तैयार होकर नीचे आजा रघु तुझे ढूंढ रहा हैं।
अपश्यु…दादा भाई ढूंढ रहे हैं चलो पहले उनसे ही मिल लेता हूं।
इतना कहकर अपश्यु बाहर को जानें लगा तभी सुरभि रोकते हुए बोली...जा पहले नहा धोकर अच्छा बच्चा बनकर आ भूत लग रहा हैं कहीं किसी मेहमान ने देख लिया तो भूत भूत चिलाते हुए भाग न जाए।
सुरभि की बाते सुनकर अपश्यु मुस्करा दिया। सुरभि अपश्यु के बिखरे बालो पर हाथ फेरकर बाहर चली गई। बड़ी मां के जाते ही अपश्यु बाथरूम में घुस गया। कुछ क्षण में बाथरूम से निकलकर टिप टॉप तैयार होकर नीचे आ गया। पहले रघु से मिला फ़िर इधर उधर के कामों को करने में लग गया।
ऐसे ही पल पल गिनते गिनते शाम हों गया। शाम को मेंहदी रस्म के चलते महिलाओं का तांता लगा गया। एक ओर महिलाएं अपने नाच गाने में लगे रहे। एक ओर मेंहदी रचाने वाले अपने अपने काम में लग गए। कोई रघु के हाथ में मेहंदी लगा रहें थे तो कोई सुकन्या, सुरभि पुष्पा के हाथों में मेंहदी लगाने में लग गए। अपश्यु और रमन दोनों एक साईड में खड़े देख रहे थें। दोनों को देखकर सुरभि बोली…अपश्यु रमन तुम दोनों मेहंदी नहीं लगवा रहें हों। तुम दोनों भी लगवा लो भाई और दोस्त की शादी हैं तुम दोनों को तो खुद से आगे आकर लगवाना चाइए था।
रमन... रानी मां शादी रघु की है हम क्यों मेहंदी लगवाए वैसे भी मेंहदी हम लड़कों के लिए नहीं लड़कियों और औरतों के लिए हैं ।
अपश्यु…. हां बडी मां मुझे नहीं लगवाना मेंहदी, मेंहदी लड़कों के हाथ में नहीं लड़कियों के हाथ में शोभा देती हैं ।
सुरभि…मेंहदी सिर्फ श्रृंगार के लिए नहीं लगाया जाता हैं। कहा जाता हैं मेंहदी का रंग जीवन में खुशियों का रंग भर देता हैं। इसलिए शादी जैसे मौके पर सभी मेंहदी लगवा सकता हैं। तुम दोनों भी लगवा लो जिससे जल्दी ही तुम्हारे जीवन में भी रंग भरने वाली कोई आ जाए।
इतना कहकर सुरभि हंस देती हैं। पुष्पा आंखे दिखाते हुए बोली...चलो आप दोनों भी मेंहदी लगवा लो नहीं तो सोच लो मेरा कहना न मानने पर आप दोनों का किया होगा।
दोनों मन ही मन बोले इतने लोगों के बीच कान पकड़ने से अच्छा मेंहदी लगवाना लेना ही ठीक रहेगा। इसलिए दोनों चुप चाप मेंहदी लगवाने बैठ गए।
उधर महेश के घर पर भी मेंहदी का रश्म शुरू हों गया। कमला को बीच में बिठाकर चारों और से कुछ महिलाएं घेरे हुए नाच गाना करने में लगी रहीं। मेंहदी रचाने वाली लड़कियां कोई कमला के हाथों और पांव में मेंहदी लगने लग गए। कमला के साथ उसकी दोनों सहेलियां बैठी बातों में मशगूल थीं
चंचल...कमला मेहंदी तो तूने पहले भी कई बार रचाया हैं आज सैयां के नाम की मेहंदी रचते हुए कैसा लग रहा हैं ।
शालू…मन में लड्डू फुट रहा होगा। बता न कमला किसी के नाम की मेहंदी जब हाथ में रचती हैं तब कैसा लगता हैं।
कमला... मैं क्यों बताऊं जब तुम दोनों के हाथ में किसी के नाम की मेहंदी रची जाएगी तब खुद ही जान जाओगे अब तुम दोनों चुप चाप मेहंदी लगवाने दो।
चंचल….मेहंदी कौन सा तेरे मुंह पर लग रही हैं जो तू हमसे बात नहीं कर सकती।
शालू...अरे शालू तू नहीं समझ रहीं हैं हमारी सखी अब हमारी नहीं रहीं सजन की हों चुकी हैं। वो भला हमसे बात क्यों करेंगी।
कमला…तुम दोनों को चुप करना हैं कि नहीं या पीट कर ही मानोगे।
चंचल...कमला तू बहुत याद आयेगी रे शादी के बाद तू हमें भुल तो नहीं जाएगी बोल न।
कमला…नही रे मैं तुम दोनों को कैसे भुल सकती हूं तुम दोनों तो मेरे सबसे प्यारी….।
कमला अधूरा बोलकर रूक गई और आंखो से नीर बहा दिया। आंखे नम शालू और चंचल की भी हों गईं। आखिर इतनों वर्षो का साथ जो छुटने वाला था। दोनों ने बहते आंसू को पोंछकर कमला के आंसू भी पोछ दिया फिर चंचल बोली...तू भूलना भी चाहेगी तो हम तुझे बोलने नहीं देंगे।
शालू...और नहीं तो क्या हम तुझे पल पल याद दिलाते रहेंगे।
इन तीनों की हसी ठिठौली फिर शुरू हों गई । लेकिन मनोरमा बेटी को मेहंदी लगते देखकर खुद को ओर न रोक पाई इसलिए एक कोने में जाकर अंचल में मुंह छुपाए रोने लग गई। महेश के नजरों से मनोरमा खुद को न छुप पाई। मनोरमा को कोने में मुंह छुपाए रोते देखकर महेश पास गया फिर बोला…मनोरमा इस ख़ुशी के मौके पर यूं आंसू बहाकर गम में न बदलो देखो हमारी बेटी कितनी खुश दिख रही हैं।
मनोरमा...कैसे न रोऊं जिन हाथों से लालन पालन कर बेटी को बडा किया एक दिन बाद उसी हाथ से बेटी को विदा करना हैं। ये सोचकर किस मां के आंख न छलके आप ही बताओं।
मनोरमा की बात सुनकर महेश के भी आंखे नम हों गया। दोनों एक दुसरे को समझाने में लग गए। कमला की नज़रे मां बाप को ढूंढ रही थीं। कमला के हाथों और पैरों में मेहंदी रचा जा चुका था। मां को दिखाकर पूछना चाहती थी मेहंदी कैसी रची हैं। ढूंढते हुए उसे मां बाप एक कोने में खड़ा दिखा। कमला उठकर उनके पास गई। फिर बोली...मां देखो तो मेरे हाथ में रची मेहंदी कैसी दिख रही हैं।
मनोरमा एक नज़र कमला के हाथ को देखा फिर कमला से लिपटकर रोने लग गई। कमला भी खुद को ओर न रोक पाई, फुट फुट कर रो दिया। दोनों कुछ क्षण तक रोते रहे फिर महेश के कहने पर दोनों अलग हुए। कमला मां को साथ लेकर गई फिर खुद पसंद करके मां के हाथों में मेहंदी रचवाया।
कुछ देर तक और मेहंदी रचने का काम चलता रहा। महिलाओं का नाच गाना भी संग संग चलता रहा। नाच गा कर जब सभी थक गए तब मेहंदी रस्म को विराम दे दिया गया।
अगले दिन शादी था तो जहा लङकी वाले बारातियों के स्वागत सत्कार की तैयारी में जुट गए वही लडके वाले बारात ले जानें की तैयारी में जुट गए। उधर संकट इस बात से परेशान था। उसे अभी तक मौका नहीं मिला था। दल बल के साथ खड़े होकर इसी पर विचार कर रहा था।
संकट...यार क्या करूं समझ ही नहीं आ रहा। कोई मौका भी नहीं बन रहा अभी अपश्यु का कुछ नहीं किया तो न जानें फ़िर कब मौका मिलेगा।
विंकट...अरे उस्ताद कोई न कोई मौका बन ही जायेगा मुझे लगता है शादी के एक दो दिन बाद ही मौका मिल जायेगा।
"अरे शादी के बाद नहीं हमे आज ही कुछ करना होगा इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा।"
"हा मौका तो अच्छा हैं लेकिन अपश्यु अकेले मिलना भी तो चाहिए ऊपर से ये ठुल्ले मामू लोगों ने अलग ही जमघट लगा रखा हैं।"
"अरे यार बड़े घर की शादी है तो पुलिस तो आयेंगे ही। यार संकट तू कुछ बता हमारा दिमाग तो काम ही नहीं कर रहा हैं।"
संकट सोच की मुद्रा में आ गया। आगे कैसे क्या किया जाए बिना पुलिस के नज़र में आए। संकट सोचने में गुम था तभी विंकट बोला... मेरे दिमाग में एक योजना है कहो तो सुनाऊं।
सभी विंकट का मुंह ताकने लग गए कुछ क्षण तक ताका झाकी करने के बाद संकट बोला…सुनता क्यों नही अब सुनने के लिए भी मूहर्त निकलबाएगा।
विंकट...उस्ताद क्यों न आप बरती बनकर बारात में सामिल हों जाओ फिर रात में सभी शादी में मगन होंगे तब कोई जाकर बहाने से अपश्यु को बुलाकर ले आना फिर किसी सुनसान जगह ले जा'कर अपना अपना भड़ास निकाल लेना।
संकट…हां ये ठीक रहेगा हम सभी बारात में बाराती बनकर चलते हैं। लडकी वालो के वहा पहुचकर कोई सुनसान जगह देखकर अपश्यु को बुलाकर लायेंगे फिर जमकर धोएंगे।
सभी संकट के बात से सहमत हों गए फिर सभी बारात में जानें की तैयारी करने चल दिए। इधर राजेंद्र के पुश्तैनी घर पर भी बरात लेकर जानें की तैयारी शुरू हों गया। सभी मेहमान भी आ चुके थे सहनाई की मधुर धुन बज रहा था। एक कमरे में रघु को तैयार किया जा रहा था। रघु को कुछ क्षण में तैयार कर दिया गया। रघु के ललाट से गाल तक चंदन के छोटे छोटे टिके लगाया गया था। पहनावे में धोती कुर्ता सिर पर सफेद शंकुआकार का टूपूर था (बंगाली समझ का ये एक पारंपरिक लिबाज है जो शादी के वक्त दूल्हे को पहनाया जाता है।)
दूल्हा रघु तैयार था तो कुछ रस्में थी जो निभाया जाना था उसे निभाने के लिए सुरभि सुकन्या रघु के कमरे में गई। रघु को सजा धजा देखकर सुकन्या रघु के पास गई फ़िर उसके कान के पास एक टीका लगा दिया। उसके बाद जो रस्में थी उसे निभाया गया। रश्म पूरा होते ही रघु को बहार लाया गया। कुछ वक्त नाच गाना हुआ। नाच गाना चलाता रहेगा किंतु बरात को समय से दूल्हा का पहुंचना जरुरी था इसलिए बरात प्रस्थान कर दिया गया। सभी बराती रघु के पीछे हों लिए भीड़ में संकट गैंग के साथ सामिल हों गया।
नाचते गाते सभी आ पहुंचे महेश के घर महेश के घर की रौनक ही अलग था। बेहतर तरीके से सजावट किया गया था। तरह तरह की लाइटों से पुरा घर चमक रहा था। गेट पर रघु को रोका गया जहां मनोरमा आकर रघु का टीका कर अन्दर आने की अनुमति दे गई। रघु की कोई साली नहीं था तो कमला की दोनों सहेली ने गेट पर ही साली होने का दायित्व निभाया शालू ने रघु का एक पैर धुलवाया फिर बोली…जीजा जी अब नग दीजिए तब दूसरा पैर धुलेगा।
रमन और अपश्यु, रघु के अगल बगल खड़े थे। अपश्यु शालू और चंचल के साथ तर्क वितर्क में उलझा रहा लेकिन रमन का उससे कोई मतलब नहीं था, सजी साबरी शालू अदभुत सुंदरी लग रही थीं। रमन बस शालू को देखने में खोया रहा। मन ही मन अलग ही सपने बुनता रहा। चंचल ने एक नज़र रमन को देखा फिर शालू के कान में कहा...शालू देख तूझे कैसे देख रहा हैं। लगता है तुझ पर फिदा हों गया।
शालू रमन की ओर देखा फिर नजरे झुका लिया। इनके क्रिया कलाप पर अपश्यु की नज़र पड़ गया। रमन को खोया देखकर रमन को हिलाया फिर बोला... किया देख रहे हों रमन भईया कोई खजाना दिख गया।
अपश्यु के बोलते ही रमन भूतल पर आया, नज़रे चुराने की तर्ज पर इधर उधर देखने लग गया। ये देख अपश्यू शालू और चंचल मुस्कुरा दिए। कुछ क्षण तक दोनों पक्षों में लेन देन को लेकर वाद विवाद चलता रहा। रमन वाद विवाद करने के दौरान बीच बीच में शालू की और देखकर ही बात करता रहा। जब दोनों की नज़रे आपस में टकरा जाती तो तुरत ही नजरे हटाकर इधर उधर देखने लग जाते। दोनों को पहली नज़र के चुंबकीय शक्ति ने आकर्षित कर लिया दोनों एक दूसरे को देख रहे थें लेकिन एक दूसरे से नज़रे बचाकर। बरहाल लेने देन का मशला सुलझा फिर रघु के दूसरे पैर को धुलवाया गया। मुंह मीठा करने के बाद रघु को अन्दर ले जाया गया।
संकट और उसके गैंग ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया। उन्हे एक खाली जगह चाहिए था तो उसे ही ढूंढने लग गए। वो भी मिल गया लेकिन खाली जगह महेश के घर से थोड़ा दूर था। वहा तक अपश्यु को लाने के लिए सभी एक योजना बनाकर अन्दर आ गए। मौका मिलते ही किसी बहाने से अपश्यु को बुलाकर बहार ले जाएंगे। लेकिन उन्हें एक डर ये भी लग रहा था महेश के घर में पुलिस की संख्या ज्यादा था कहीं वो पुलिस के नज़र में न आ जाएं।
इधर मंडप में आने के बाद रघु को एक सोफे पर बैठा दिया गया रघु के अगल बगल रमन अपश्यु और पुष्पा बैठ गए। रमन इधर उधर नज़रे घुमा किसी को ढूंढने लगा, अनगिनत चेहरे दिख रहा हैं पर जिस चेहरे की उसे तलाश हैं वो नहीं दिख रहा। यूं इधर उधर रमन का मुंडी हिलाना पुष्पा को दिख गया तो पुष्पा बोली... रमन भईया इधर उधर किया देख रहे हों कुछ चाहिए था।
रमन झेपकर बोला... नही नही कुछ नहीं चाहिए।
अपश्यु…मैं जनता हूं रमन भईया को किया चाहिए बता दूं रमन भईया।
रमन...नहीं अपश्यु! कुछ न बताना, बता दिया तो देख लेना अच्छा नहीं होगा।
पुष्पा...umhuuu किया छुपा रहे हों। जल्दी बताओं।
रघु... हा रमन बता न बात किया बात हैं।
रमन टाला मटोली करने में लगा रहा। इतना पुछने पर भी जब रमन नहीं बताया तो अपश्यु ने रघु के कान में कुछ बोला, सुनकर रघु मुस्कुराया फ़िर बोला...क्या यार इतनी सी बात बोलने में शर्मा रहा हैं रूक अभी मैं किसी को बुलाता हूं।
रघु ने आस पास घूम रहे वेटर में से एक को बुलाया फिर रमन को दिखाते हुए बोला…इसे फ्रेश होने जाना हैं। क्या आप इसको ले'कर जा सकते हों।
रमन…मैंने कब कहा मुझे बाथरूम जाना हैं।
अपश्यु मुंह पर हाथ रखकर हंसते हुए वेटर को जानें को कहा फिर एक बार रघु के कान में कुछ कहा तब रघु बोला... क्यों रे रमन मेरी शादी करवाने आया या अपनी वाली ढूंढने आया बता।
रमन…अपश्यु तूझे माना कर था न फ़िर क्यों बताया।
रमन अपश्यु और रघु हल्की हल्की आवाज में बात कर रहे थें। तो पुष्पा को न कुछ सुनाई दे रहा था न ही कुछ समझ आ रहा था इसलिए पुष्पा बोली...आप तीनों में क्या खिचड़ी पक रहा हैं मुझे बातों नहीं तो सोच लो खिचड़ी खाने लायक नहीं रहेगा।
अपश्यु...पुष्पा मैं बताता हूं फिर अपश्यु ने शालू और रमन के बीच के नैन मटका वाला किस्सा सुना दिया। सुनकर पुष्पा बोली... तो ये बात हैं। वैसे रमन भईया आप'को लड़की पसन्द है तो इस मामले में भाभी ही कुछ मदद कर सकती हैं आप'को उनसे ही मदद मांगना चाहिए।
इसके बाद तो तीनों मिलकर रमन को छेड़ने लग गए। कुछ वक्त तक इनका रमन को छेड़ना चलता रहा। पुरोहित जी आए आते ही मंडप में सभी तैयारी कर लिया फिर उन्होंने रघु को मंडप में आने को कहा। रघु हाथ मुंह धोकर मंडप में बैठ गया। कुछ देर बाद पुरोहित ने कहा कन्या को बुलाया जाए। कुछ क्षण में कमला घूंघट उड़े दुल्हन के लिवास में शालू और चंचल के साथ सीढ़ी से धीरे धीर चलकर आने लगीं। दुल्हन के लिवास में कमला को देखकर कमला के चेहरे को देखने के लिए रघु तरसने लगा बस जतन कर रहा था किसी तरह कमला का चेहरा दिख जाएं पर ऐसा कुछ हुआ ही नहीं क्योंकि कमला का चेहरा अच्छे से ढका हुआ था। अब तो चेहरे पर लगा पर्दा शूभोदृष्टि की रश्म करते वक्त ही दिखाई देगा।
रमन एक टक शालू को देखने में लगा रहा आस पास किया हों रहा हैं। कौन क्या कह रहा हैं उससे कुछ लेना देना नहीं था। किसी से कुछ वास्ता हैं तो सिर्फ और सिर्फ शालू है। बीच बीच में शालू भी रमन की और देख लिया करती, जैसे ही दोनों की नज़रे आपस में मिल जाता। शालू नज़रे झुकाकर मंद मंद मुस्कुरा देती। रमन और शालू का नैन मटका करना पुष्पा के नज़र में आ गया। तो रमन को कोहनी मरकर धीरे से कान में बोली... भईया क्या कर रहे हों थोड़ा कम देखो नहीं तो लड़की आप'को छिछोरा समझ बैठेगी।
रमन झेपकर नज़रे नीचे कर लिया। दुल्हन कमला मण्डप में पहूंच गई कमला के मंडप में बैठते ही शादी की विधि शुरू हों गया। राजेंद्र ये देख खुशी के आंसु बहने लग गया। कितनी कोशिशों के बाद आज उसे ये दिन देखना नसीब हो रहा था। रावण मन ही मन खुद को गाली दिया। इतना यतन करने के बाद भी जो नहीं चाहता था वो आज उसके आंखो के सामने हों रहा था।
खैर कुछ क्षण बाद पूतोहित जी के कहने पर महेश मंडप में पधारे रघु और कमला का गठबन्धन कर कमला का हाथ रघु को सौफकर कन्या दान का रश्म भीगे नैनों से पूर्ण किया। रश्म के दौरान कमला के नैन अविरल बह चली मानो कमला के नैनों ने बहुत समय से बंधकर रखी हुई समुंदर के बांध को हमेशा हमेशा के लिए खोल दिया हों।
कन्या दान के रश्म के बाद उसे बाप का घर छोड़कर एक नए घर में जाकर वहा के रीति रिवाज के अनुसार चलना हैं। जितनी आजादी बाप के घर में मिला करती थीं शायद ससुराल में वो आजादी छीन ली जाए और चार दिवारी में कैद कर लिया जाएं। जिस तरह ससुराल पक्ष चाहेगा वैसे ही कमला को आचरण करना हैं। एक नया रिश्ता निभाना हैं। मां बाप के साथ साथ सास ससुर के मान इज्जत का ख्याल रखना हैं। नए सिरे से सभी के साथ अपनेपन का रिश्ता जोड़ना हैं। एक नवजात शिशु की तरह एक बार फ़िर से जीवन यात्रा शुरू करना हैं। इस यात्रा में उसका साथी मां बाप नहीं बल्कि पति, सास, ससुर उनका परिवार होगा।
इधर कन्या दान का रश्म चल रहा था उधर संकट के भेजे एक आदमी ने आकर अपश्यु से कहा...साहब आप'को कोई बहार बुला रहा हैं।
अपश्यु... कौन है? मैं तो यह के किसी को नहीं जनता।
"साहब वो तो मैं नहीं जनता लेकिन वो कह रहें थें आप उनके घनिष्ट मित्र हैं।"
घनिष्ट मित्र की बात सुनकर अपश्यु उठाकर उसके साथ चल दिया। अपश्यु को लगा शायद दार्जलिंग से उसका कोई दोस्त आया होगा।
आज के लिए इतना ही आगे की कहानी अगले अपडेट से जानेंगे। यहां तक साथ बने रहने के लिए अभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद
ek ajib sa kasmakas chal raha ho apsyu dimag me. akkhir usne apne zameer ki baat suni aur ye decide kiya ke raghu kamla ki shadi ke baad sari gunaho ko kubul karke mafi mang lega sabhi se.Update - 31
रात आई और चली गई की तर्ज पर बीती रात घाटी घटना को भुलाकर सभी फिर से नए जोश और जुनून के साथ शादी के जश्न मानने की तैयारी में झूट गए। आज महेंदी का रश्म था। दोनों के हाथों को महेंदी के रंग से रंगा जाना हैं। ताकि महेंदी का रंग दोनों के दांपत्य जीवन को खुशियों से भर दे।
राजेंद्र के पुश्तैनी घर में सभी अपने अपने तैयारी में भगा दौड़ी करने में लगे हुए थें। इन सभी चका चौंध से दूर अपश्यु रूम में अकेला बैठा था। अपश्यु का अपराध बोध उस पर इतना हावी हों चुका था। चाह कर भी अपराध बोध से खुद को मुक्त नहीं करा पा रहा था। सिर्फ अपराध बोध ही नहीं अब तो उसे ये डर भी सता रहा था मां, बडी मां, बहन, भाई, पापा और बड़े पापा का सामना कैसे करे पाएगा। उसके नीच और गिरे हुए कुकर्मों की भनक उन्हें लग गया तो न जानें वो कैसा व्यवहार अपश्यु के साथ करेगें। अपश्यु का मन दो हिस्सों में बाटकर विभिन्न दिशाओं में भटकाकर अलग अलग तर्क दे रहा था। अपश्यु इन्हीं तर्को में उलझकर रह गया।
अपश्यु का एक मन...अरे हो गया गलती अब छोड़ इन बातों को आगे बढ़, दुनियां में बहुत से लोग हैं जो तूझसे भी गिरा हुआ नीच काम करते हैं। वो तो इतना नहीं सोचते। तू क्यों सोच के अथाह सागर में डूब रहा हैं।
दूसरा मन...इससे भी नीच काम ओर क्या हों सकता हैं तूने न जानें कितनो के बहु बेटियो को खिलौना समझकर उनके साथ खेला उनके आबरू को तार तार किया तू दुनिया का सबसे नीच इंसान हैं। तूने दुनिया का सबसे नीच काम किया हैं जारा सोच गहराई से तूने क्या किया हैं।
पहला मन...तूने कोई नीच काम नहीं किया ये तो तेरा स्वभाव हैं। तूने स्वभाव अनुसार ही व्यवहार किया था। इसमें इतना अपराध बोध क्यों करना, तू जैसा हैं बिल्कुल ठीक हैं। तू ऐसे ही रहना। थोड़ा सा भी परिवर्तन खुद में न लाना।
दुसरा मन...तू अपराधी हैं। तुझे अपराध बोध होना ही चाहिए। तूने देखा न कैसे कालू और बबलू के मां बाप नाक रगड़ रगड़ कर माफ़ी मांग रहे थें तू सोच तेरे मां पर किया बीतेगा जब उन्हें पता चलेगा तूने कितना गिरा हुआ हरकत किया था। सोच जब तेरी बहन ये जन पाएगी उसका भाई दूसरे के बहनों के इज्जत को तार तार करने का घिनौना काम किया हैं तब तू किया करेगा , तेरी बडी मां जो तुझे अपने सगे बेटे की तरह प्यार दिया जब उन्हें पाता चलेगा तूने उनके दमन में न जानें कितने दाग लगाया तब तू किया करेगा? सोच जब तेरा दोस्त जैसा भाई जो तेरे एक बार बोलने से तेरा मन चाह काम करता था तेरा किया सभी दोष अपने सिर लेकर डांट सुनता था। उसे पता चलेगा तब किया करेगा। अभी समय हैं जा उन सभी से माफी मांग ले उन्होंने अगर माफ कर दिया तो समझ लेना ऊपर वाले ने भी तुझे माफ कर दिया।
पहला मन…नहीं तू ऐसा बिल्कुल भी मत करना नहीं तो वो माफ करने के जगह तुझे धूतकर देंगे। उनके नज़र में तू एक अच्छा लडका हैं सच बोलते ही तू उनके नजरों में गिर जायेगा। तू दुनिया के नज़र में चाहें जितना भी गिरा हुआ हों उनके नजरों में तू एक अच्छा लडका हैं। इसलिए तेरा चुप रहना ही बेहतर हैं।
दुसरा मन…सोच जारा जब तेरे मां, बाप, बडी मां, बड़े पापा, भाई , बहन दूसरे से जान पाएंगे उनका बेटा भाई कितना गिरा हुआ हैं। तब उन्हें कितना कष्ट पहुंचेगा हों सकता है उन्हें तेरे कारण दूसरे के सामने नाक भी रगड़ना पड़े तब तू किया करेगा उनका अपमान सह पाएगा कल ही कि बात सोच जब उन लड़कों ने तेरे बहन को छेड़ा फिर उनके मां बाप को कितना जलील होना पडा, इतना जलील होते हुए तू अपने मां बाप को देख पाएगा। अगर देख सकता हैं तो ठीक हैं तू चल उस रास्ते पर जिस पर चलने का तेरा दिल चाहें। लेकिन एक बात ध्यान रखना आज मौका मिला हैं सुधार जा नहीं तो हों सकता हैं आगे सुधरने का मौका ही न मिले।
अपश्यु के बांटे हुए दोनों मनो के बिच जंग चल रहा था। तर्क वितर्क का एक लंबा दौर चला फिर अपश्यु का दुसरा मन पहले मन पर हावी हों गया। दूसरे मन की बात मानकर अपश्यु खुद से बोला... मैं सभी को सच बता दुंगा लेकिन आज नहीं आज अगर मैने उन्हे सच बता दिया ददाभाई के शादी के ख़ुशी का रंग जो चढ़ा हुआ है वो फीका पड़ जायेगा मैं शादी के बाद अपना करतूत उन्हे बता दुंगा और उनसे माफ़ी मांग लूंगा। माफ किया तो ठीक नहीं तो कहीं दूर चला जाऊंगा।
अपश्यु खुद में ही विचाराधीन था और उधर अपश्यु को न देख सभी उसे ढूंढ रहे थें। लेकिन उन्हें अपश्यु कहीं मिल ही नहीं रहा था। रघु अपश्यु को ढूंढते हुए सुरभि के पास पहुंचा और बोला...मां अपने अपश्यु को कही देखा हैं न जाने कहा गया कब से ढूंढ रहा हूं।
सुरभि…मैं भी उसे नहीं देखा कुछ जरूरी काम था जो उसे ढूंढ रहा हैं।
रघु…मां जरुरी काम तो कुछ नहीं सभी को देख रहा हूं बस अपश्यु सुबह से अभी तक नहीं दिखा इसलिए पुछ रहा हूं
सुरभि…ठीक है मैं देखती हूं।
सुरभि पूछताछ करते हुए। सुकन्या के पास पहुंचा सुकन्या उस वक्त कुछ महिलाओं के साथ बैठी बातों में मशगूल थीं।
सुरभि...छोटी अपश्यु कहा है उसका कुछ खबर हैं रघु कब से उसे ढूंढ रहा हैं।
सुकन्या... दीदी अपश्यु अपने रूम में हैं न जानें कितना सोता हैं कितनी बार आवाज दिया कोई जवाब नहीं दिया आप जाकर देखो न हों सकता है आप'की बात मान ले।
सुरभि... ठीक हैं मै देखती हूं।
सुरभि सीधा चल दिया अपश्यु के रुम की तरफ रूम पर पहुंचकर देखा दरवाजा बन्द हैं। हल्का सा मुस्कुराकर दरवाज़ा पीटने लग गई। लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला फिर दरवाज़ा दुबारा पीटते हुए बोली…अपश्यु दरवाज़ा खोल, जल्दी खोल बेटा तुझे रघु बुला रहा हैं।
अपश्यु अभी अभी विचारों के जंगल से बाहर निकला था। बडी मां की आवाज़ सुनकर आंखे मलते हुए दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही सुरभि बोली…ये kuyaaa…।
सुरभि पूरा बोल ही नहीं पाई अपश्यु की लाल आंखे देखकर रूक गई फिर अपश्यु बोला…. हा बडी मां बोलों कुछ काम था।
सुरभि... बेटा माना की देर रात तक जागे हों फिर भी इतने देर तक सोना अच्छा नहीं हैं। घर में शादी हैं आए हुए महमानो का अवभागत करना भी जरुरी हैं।
अपश्यु जग तो बहुत पहले गया था। कल घटी घटना के करण खुद में उलझा हुआ था पर ये बात न बताकर अपश्यु बहाना बना दिया।
अपश्यु... बडी मां देर रात तक जगा था तो आंख ही नहीं खुला अब किया करता।
सुरभि…अब जाओ जल्दी से तैयार होकर नीचे आजा रघु तुझे ढूंढ रहा हैं।
अपश्यु…दादा भाई ढूंढ रहे हैं चलो पहले उनसे ही मिल लेता हूं।
इतना कहकर अपश्यु बाहर को जानें लगा तभी सुरभि रोकते हुए बोली...जा पहले नहा धोकर अच्छा बच्चा बनकर आ भूत लग रहा हैं कहीं किसी मेहमान ने देख लिया तो भूत भूत चिलाते हुए भाग न जाए।
सुरभि की बाते सुनकर अपश्यु मुस्करा दिया। सुरभि अपश्यु के बिखरे बालो पर हाथ फेरकर बाहर चली गई। बड़ी मां के जाते ही अपश्यु बाथरूम में घुस गया। कुछ क्षण में बाथरूम से निकलकर टिप टॉप तैयार होकर नीचे आ गया। पहले रघु से मिला फ़िर इधर उधर के कामों को करने में लग गया।
ऐसे ही पल पल गिनते गिनते शाम हों गया। शाम को मेंहदी रस्म के चलते महिलाओं का तांता लगा गया। एक ओर महिलाएं अपने नाच गाने में लगे रहे। एक ओर मेंहदी रचाने वाले अपने अपने काम में लग गए। कोई रघु के हाथ में मेहंदी लगा रहें थे तो कोई सुकन्या, सुरभि पुष्पा के हाथों में मेंहदी लगाने में लग गए। अपश्यु और रमन दोनों एक साईड में खड़े देख रहे थें। दोनों को देखकर सुरभि बोली…अपश्यु रमन तुम दोनों मेहंदी नहीं लगवा रहें हों। तुम दोनों भी लगवा लो भाई और दोस्त की शादी हैं तुम दोनों को तो खुद से आगे आकर लगवाना चाइए था।
रमन... रानी मां शादी रघु की है हम क्यों मेहंदी लगवाए वैसे भी मेंहदी हम लड़कों के लिए नहीं लड़कियों और औरतों के लिए हैं ।
अपश्यु…. हां बडी मां मुझे नहीं लगवाना मेंहदी, मेंहदी लड़कों के हाथ में नहीं लड़कियों के हाथ में शोभा देती हैं ।
सुरभि…मेंहदी सिर्फ श्रृंगार के लिए नहीं लगाया जाता हैं। कहा जाता हैं मेंहदी का रंग जीवन में खुशियों का रंग भर देता हैं। इसलिए शादी जैसे मौके पर सभी मेंहदी लगवा सकता हैं। तुम दोनों भी लगवा लो जिससे जल्दी ही तुम्हारे जीवन में भी रंग भरने वाली कोई आ जाए।
इतना कहकर सुरभि हंस देती हैं। पुष्पा आंखे दिखाते हुए बोली...चलो आप दोनों भी मेंहदी लगवा लो नहीं तो सोच लो मेरा कहना न मानने पर आप दोनों का किया होगा।
दोनों मन ही मन बोले इतने लोगों के बीच कान पकड़ने से अच्छा मेंहदी लगवाना लेना ही ठीक रहेगा। इसलिए दोनों चुप चाप मेंहदी लगवाने बैठ गए।
उधर महेश के घर पर भी मेंहदी का रश्म शुरू हों गया। कमला को बीच में बिठाकर चारों और से कुछ महिलाएं घेरे हुए नाच गाना करने में लगी रहीं। मेंहदी रचाने वाली लड़कियां कोई कमला के हाथों और पांव में मेंहदी लगने लग गए। कमला के साथ उसकी दोनों सहेलियां बैठी बातों में मशगूल थीं
चंचल...कमला मेहंदी तो तूने पहले भी कई बार रचाया हैं आज सैयां के नाम की मेहंदी रचते हुए कैसा लग रहा हैं ।
शालू…मन में लड्डू फुट रहा होगा। बता न कमला किसी के नाम की मेहंदी जब हाथ में रचती हैं तब कैसा लगता हैं।
कमला... मैं क्यों बताऊं जब तुम दोनों के हाथ में किसी के नाम की मेहंदी रची जाएगी तब खुद ही जान जाओगे अब तुम दोनों चुप चाप मेहंदी लगवाने दो।
चंचल….मेहंदी कौन सा तेरे मुंह पर लग रही हैं जो तू हमसे बात नहीं कर सकती।
शालू...अरे शालू तू नहीं समझ रहीं हैं हमारी सखी अब हमारी नहीं रहीं सजन की हों चुकी हैं। वो भला हमसे बात क्यों करेंगी।
कमला…तुम दोनों को चुप करना हैं कि नहीं या पीट कर ही मानोगे।
चंचल...कमला तू बहुत याद आयेगी रे शादी के बाद तू हमें भुल तो नहीं जाएगी बोल न।
कमला…नही रे मैं तुम दोनों को कैसे भुल सकती हूं तुम दोनों तो मेरे सबसे प्यारी….।
कमला अधूरा बोलकर रूक गई और आंखो से नीर बहा दिया। आंखे नम शालू और चंचल की भी हों गईं। आखिर इतनों वर्षो का साथ जो छुटने वाला था। दोनों ने बहते आंसू को पोंछकर कमला के आंसू भी पोछ दिया फिर चंचल बोली...तू भूलना भी चाहेगी तो हम तुझे बोलने नहीं देंगे।
शालू...और नहीं तो क्या हम तुझे पल पल याद दिलाते रहेंगे।
इन तीनों की हसी ठिठौली फिर शुरू हों गई । लेकिन मनोरमा बेटी को मेहंदी लगते देखकर खुद को ओर न रोक पाई इसलिए एक कोने में जाकर अंचल में मुंह छुपाए रोने लग गई। महेश के नजरों से मनोरमा खुद को न छुप पाई। मनोरमा को कोने में मुंह छुपाए रोते देखकर महेश पास गया फिर बोला…मनोरमा इस ख़ुशी के मौके पर यूं आंसू बहाकर गम में न बदलो देखो हमारी बेटी कितनी खुश दिख रही हैं।
मनोरमा...कैसे न रोऊं जिन हाथों से लालन पालन कर बेटी को बडा किया एक दिन बाद उसी हाथ से बेटी को विदा करना हैं। ये सोचकर किस मां के आंख न छलके आप ही बताओं।
मनोरमा की बात सुनकर महेश के भी आंखे नम हों गया। दोनों एक दुसरे को समझाने में लग गए। कमला की नज़रे मां बाप को ढूंढ रही थीं। कमला के हाथों और पैरों में मेहंदी रचा जा चुका था। मां को दिखाकर पूछना चाहती थी मेहंदी कैसी रची हैं। ढूंढते हुए उसे मां बाप एक कोने में खड़ा दिखा। कमला उठकर उनके पास गई। फिर बोली...मां देखो तो मेरे हाथ में रची मेहंदी कैसी दिख रही हैं।
मनोरमा एक नज़र कमला के हाथ को देखा फिर कमला से लिपटकर रोने लग गई। कमला भी खुद को ओर न रोक पाई, फुट फुट कर रो दिया। दोनों कुछ क्षण तक रोते रहे फिर महेश के कहने पर दोनों अलग हुए। कमला मां को साथ लेकर गई फिर खुद पसंद करके मां के हाथों में मेहंदी रचवाया।
कुछ देर तक और मेहंदी रचने का काम चलता रहा। महिलाओं का नाच गाना भी संग संग चलता रहा। नाच गा कर जब सभी थक गए तब मेहंदी रस्म को विराम दे दिया गया।
अगले दिन शादी था तो जहा लङकी वाले बारातियों के स्वागत सत्कार की तैयारी में जुट गए वही लडके वाले बारात ले जानें की तैयारी में जुट गए। उधर संकट इस बात से परेशान था। उसे अभी तक मौका नहीं मिला था। दल बल के साथ खड़े होकर इसी पर विचार कर रहा था।
संकट...यार क्या करूं समझ ही नहीं आ रहा। कोई मौका भी नहीं बन रहा अभी अपश्यु का कुछ नहीं किया तो न जानें फ़िर कब मौका मिलेगा।
विंकट...अरे उस्ताद कोई न कोई मौका बन ही जायेगा मुझे लगता है शादी के एक दो दिन बाद ही मौका मिल जायेगा।
"अरे शादी के बाद नहीं हमे आज ही कुछ करना होगा इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा।"
"हा मौका तो अच्छा हैं लेकिन अपश्यु अकेले मिलना भी तो चाहिए ऊपर से ये ठुल्ले मामू लोगों ने अलग ही जमघट लगा रखा हैं।"
"अरे यार बड़े घर की शादी है तो पुलिस तो आयेंगे ही। यार संकट तू कुछ बता हमारा दिमाग तो काम ही नहीं कर रहा हैं।"
संकट सोच की मुद्रा में आ गया। आगे कैसे क्या किया जाए बिना पुलिस के नज़र में आए। संकट सोचने में गुम था तभी विंकट बोला... मेरे दिमाग में एक योजना है कहो तो सुनाऊं।
सभी विंकट का मुंह ताकने लग गए कुछ क्षण तक ताका झाकी करने के बाद संकट बोला…सुनता क्यों नही अब सुनने के लिए भी मूहर्त निकलबाएगा।
विंकट...उस्ताद क्यों न आप बरती बनकर बारात में सामिल हों जाओ फिर रात में सभी शादी में मगन होंगे तब कोई जाकर बहाने से अपश्यु को बुलाकर ले आना फिर किसी सुनसान जगह ले जा'कर अपना अपना भड़ास निकाल लेना।
संकट…हां ये ठीक रहेगा हम सभी बारात में बाराती बनकर चलते हैं। लडकी वालो के वहा पहुचकर कोई सुनसान जगह देखकर अपश्यु को बुलाकर लायेंगे फिर जमकर धोएंगे।
सभी संकट के बात से सहमत हों गए फिर सभी बारात में जानें की तैयारी करने चल दिए। इधर राजेंद्र के पुश्तैनी घर पर भी बरात लेकर जानें की तैयारी शुरू हों गया। सभी मेहमान भी आ चुके थे सहनाई की मधुर धुन बज रहा था। एक कमरे में रघु को तैयार किया जा रहा था। रघु को कुछ क्षण में तैयार कर दिया गया। रघु के ललाट से गाल तक चंदन के छोटे छोटे टिके लगाया गया था। पहनावे में धोती कुर्ता सिर पर सफेद शंकुआकार का टूपूर था (बंगाली समझ का ये एक पारंपरिक लिबाज है जो शादी के वक्त दूल्हे को पहनाया जाता है।)
दूल्हा रघु तैयार था तो कुछ रस्में थी जो निभाया जाना था उसे निभाने के लिए सुरभि सुकन्या रघु के कमरे में गई। रघु को सजा धजा देखकर सुकन्या रघु के पास गई फ़िर उसके कान के पास एक टीका लगा दिया। उसके बाद जो रस्में थी उसे निभाया गया। रश्म पूरा होते ही रघु को बहार लाया गया। कुछ वक्त नाच गाना हुआ। नाच गाना चलाता रहेगा किंतु बरात को समय से दूल्हा का पहुंचना जरुरी था इसलिए बरात प्रस्थान कर दिया गया। सभी बराती रघु के पीछे हों लिए भीड़ में संकट गैंग के साथ सामिल हों गया।
नाचते गाते सभी आ पहुंचे महेश के घर महेश के घर की रौनक ही अलग था। बेहतर तरीके से सजावट किया गया था। तरह तरह की लाइटों से पुरा घर चमक रहा था। गेट पर रघु को रोका गया जहां मनोरमा आकर रघु का टीका कर अन्दर आने की अनुमति दे गई। रघु की कोई साली नहीं था तो कमला की दोनों सहेली ने गेट पर ही साली होने का दायित्व निभाया शालू ने रघु का एक पैर धुलवाया फिर बोली…जीजा जी अब नग दीजिए तब दूसरा पैर धुलेगा।
रमन और अपश्यु, रघु के अगल बगल खड़े थे। अपश्यु शालू और चंचल के साथ तर्क वितर्क में उलझा रहा लेकिन रमन का उससे कोई मतलब नहीं था, सजी साबरी शालू अदभुत सुंदरी लग रही थीं। रमन बस शालू को देखने में खोया रहा। मन ही मन अलग ही सपने बुनता रहा। चंचल ने एक नज़र रमन को देखा फिर शालू के कान में कहा...शालू देख तूझे कैसे देख रहा हैं। लगता है तुझ पर फिदा हों गया।
शालू रमन की ओर देखा फिर नजरे झुका लिया। इनके क्रिया कलाप पर अपश्यु की नज़र पड़ गया। रमन को खोया देखकर रमन को हिलाया फिर बोला... किया देख रहे हों रमन भईया कोई खजाना दिख गया।
अपश्यु के बोलते ही रमन भूतल पर आया, नज़रे चुराने की तर्ज पर इधर उधर देखने लग गया। ये देख अपश्यू शालू और चंचल मुस्कुरा दिए। कुछ क्षण तक दोनों पक्षों में लेन देन को लेकर वाद विवाद चलता रहा। रमन वाद विवाद करने के दौरान बीच बीच में शालू की और देखकर ही बात करता रहा। जब दोनों की नज़रे आपस में टकरा जाती तो तुरत ही नजरे हटाकर इधर उधर देखने लग जाते। दोनों को पहली नज़र के चुंबकीय शक्ति ने आकर्षित कर लिया दोनों एक दूसरे को देख रहे थें लेकिन एक दूसरे से नज़रे बचाकर। बरहाल लेने देन का मशला सुलझा फिर रघु के दूसरे पैर को धुलवाया गया। मुंह मीठा करने के बाद रघु को अन्दर ले जाया गया।
संकट और उसके गैंग ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया। उन्हे एक खाली जगह चाहिए था तो उसे ही ढूंढने लग गए। वो भी मिल गया लेकिन खाली जगह महेश के घर से थोड़ा दूर था। वहा तक अपश्यु को लाने के लिए सभी एक योजना बनाकर अन्दर आ गए। मौका मिलते ही किसी बहाने से अपश्यु को बुलाकर बहार ले जाएंगे। लेकिन उन्हें एक डर ये भी लग रहा था महेश के घर में पुलिस की संख्या ज्यादा था कहीं वो पुलिस के नज़र में न आ जाएं।
इधर मंडप में आने के बाद रघु को एक सोफे पर बैठा दिया गया रघु के अगल बगल रमन अपश्यु और पुष्पा बैठ गए। रमन इधर उधर नज़रे घुमा किसी को ढूंढने लगा, अनगिनत चेहरे दिख रहा हैं पर जिस चेहरे की उसे तलाश हैं वो नहीं दिख रहा। यूं इधर उधर रमन का मुंडी हिलाना पुष्पा को दिख गया तो पुष्पा बोली... रमन भईया इधर उधर किया देख रहे हों कुछ चाहिए था।
रमन झेपकर बोला... नही नही कुछ नहीं चाहिए।
अपश्यु…मैं जनता हूं रमन भईया को किया चाहिए बता दूं रमन भईया।
रमन...नहीं अपश्यु! कुछ न बताना, बता दिया तो देख लेना अच्छा नहीं होगा।
पुष्पा...umhuuu किया छुपा रहे हों। जल्दी बताओं।
रघु... हा रमन बता न बात किया बात हैं।
रमन टाला मटोली करने में लगा रहा। इतना पुछने पर भी जब रमन नहीं बताया तो अपश्यु ने रघु के कान में कुछ बोला, सुनकर रघु मुस्कुराया फ़िर बोला...क्या यार इतनी सी बात बोलने में शर्मा रहा हैं रूक अभी मैं किसी को बुलाता हूं।
रघु ने आस पास घूम रहे वेटर में से एक को बुलाया फिर रमन को दिखाते हुए बोला…इसे फ्रेश होने जाना हैं। क्या आप इसको ले'कर जा सकते हों।
रमन…मैंने कब कहा मुझे बाथरूम जाना हैं।
अपश्यु मुंह पर हाथ रखकर हंसते हुए वेटर को जानें को कहा फिर एक बार रघु के कान में कुछ कहा तब रघु बोला... क्यों रे रमन मेरी शादी करवाने आया या अपनी वाली ढूंढने आया बता।
रमन…अपश्यु तूझे माना कर था न फ़िर क्यों बताया।
रमन अपश्यु और रघु हल्की हल्की आवाज में बात कर रहे थें। तो पुष्पा को न कुछ सुनाई दे रहा था न ही कुछ समझ आ रहा था इसलिए पुष्पा बोली...आप तीनों में क्या खिचड़ी पक रहा हैं मुझे बातों नहीं तो सोच लो खिचड़ी खाने लायक नहीं रहेगा।
अपश्यु...पुष्पा मैं बताता हूं फिर अपश्यु ने शालू और रमन के बीच के नैन मटका वाला किस्सा सुना दिया। सुनकर पुष्पा बोली... तो ये बात हैं। वैसे रमन भईया आप'को लड़की पसन्द है तो इस मामले में भाभी ही कुछ मदद कर सकती हैं आप'को उनसे ही मदद मांगना चाहिए।
इसके बाद तो तीनों मिलकर रमन को छेड़ने लग गए। कुछ वक्त तक इनका रमन को छेड़ना चलता रहा। पुरोहित जी आए आते ही मंडप में सभी तैयारी कर लिया फिर उन्होंने रघु को मंडप में आने को कहा। रघु हाथ मुंह धोकर मंडप में बैठ गया। कुछ देर बाद पुरोहित ने कहा कन्या को बुलाया जाए। कुछ क्षण में कमला घूंघट उड़े दुल्हन के लिवास में शालू और चंचल के साथ सीढ़ी से धीरे धीर चलकर आने लगीं। दुल्हन के लिवास में कमला को देखकर कमला के चेहरे को देखने के लिए रघु तरसने लगा बस जतन कर रहा था किसी तरह कमला का चेहरा दिख जाएं पर ऐसा कुछ हुआ ही नहीं क्योंकि कमला का चेहरा अच्छे से ढका हुआ था। अब तो चेहरे पर लगा पर्दा शूभोदृष्टि की रश्म करते वक्त ही दिखाई देगा।
रमन एक टक शालू को देखने में लगा रहा आस पास किया हों रहा हैं। कौन क्या कह रहा हैं उससे कुछ लेना देना नहीं था। किसी से कुछ वास्ता हैं तो सिर्फ और सिर्फ शालू है। बीच बीच में शालू भी रमन की और देख लिया करती, जैसे ही दोनों की नज़रे आपस में मिल जाता। शालू नज़रे झुकाकर मंद मंद मुस्कुरा देती। रमन और शालू का नैन मटका करना पुष्पा के नज़र में आ गया। तो रमन को कोहनी मरकर धीरे से कान में बोली... भईया क्या कर रहे हों थोड़ा कम देखो नहीं तो लड़की आप'को छिछोरा समझ बैठेगी।
रमन झेपकर नज़रे नीचे कर लिया। दुल्हन कमला मण्डप में पहूंच गई कमला के मंडप में बैठते ही शादी की विधि शुरू हों गया। राजेंद्र ये देख खुशी के आंसु बहने लग गया। कितनी कोशिशों के बाद आज उसे ये दिन देखना नसीब हो रहा था। रावण मन ही मन खुद को गाली दिया। इतना यतन करने के बाद भी जो नहीं चाहता था वो आज उसके आंखो के सामने हों रहा था।
खैर कुछ क्षण बाद पूतोहित जी के कहने पर महेश मंडप में पधारे रघु और कमला का गठबन्धन कर कमला का हाथ रघु को सौफकर कन्या दान का रश्म भीगे नैनों से पूर्ण किया। रश्म के दौरान कमला के नैन अविरल बह चली मानो कमला के नैनों ने बहुत समय से बंधकर रखी हुई समुंदर के बांध को हमेशा हमेशा के लिए खोल दिया हों।
कन्या दान के रश्म के बाद उसे बाप का घर छोड़कर एक नए घर में जाकर वहा के रीति रिवाज के अनुसार चलना हैं। जितनी आजादी बाप के घर में मिला करती थीं शायद ससुराल में वो आजादी छीन ली जाए और चार दिवारी में कैद कर लिया जाएं। जिस तरह ससुराल पक्ष चाहेगा वैसे ही कमला को आचरण करना हैं। एक नया रिश्ता निभाना हैं। मां बाप के साथ साथ सास ससुर के मान इज्जत का ख्याल रखना हैं। नए सिरे से सभी के साथ अपनेपन का रिश्ता जोड़ना हैं। एक नवजात शिशु की तरह एक बार फ़िर से जीवन यात्रा शुरू करना हैं। इस यात्रा में उसका साथी मां बाप नहीं बल्कि पति, सास, ससुर उनका परिवार होगा।
इधर कन्या दान का रश्म चल रहा था उधर संकट के भेजे एक आदमी ने आकर अपश्यु से कहा...साहब आप'को कोई बहार बुला रहा हैं।
अपश्यु... कौन है? मैं तो यह के किसी को नहीं जनता।
"साहब वो तो मैं नहीं जनता लेकिन वो कह रहें थें आप उनके घनिष्ट मित्र हैं।"
घनिष्ट मित्र की बात सुनकर अपश्यु उठाकर उसके साथ चल दिया। अपश्यु को लगा शायद दार्जलिंग से उसका कोई दोस्त आया होगा।
आज के लिए इतना ही आगे की कहानी अगले अपडेट से जानेंगे। यहां तक साथ बने रहने के लिए अभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद
So raghu ke liye ladki bhi dekhi ja rahi hai aur jaha Pehle log shadi ke liye ha Keh de rahe hai wahi Phir baat mai mukar ja rahe hai ye Keh kar ki raghu ke kai ladkiyon se relation hai shayad in sab ke piche ravan hi hoga jo ki nahi chahta raghu ki shadi ho.Update - 6
राजेंद्र…सुरभि मेरे परेशानी का करण कई हैं जो पिछले कुछ दिनों से मेरे चिन्ता का विषय बना हुआ था। सभी के नजरों से छुपा लिया लेकिन तुम्हारे नजरों से छुपा नहीं पाया। मेरे परेशानियों में से सबसे बाड़ी परेशानी हमारा बेटा रघु हैं।
सुरभि…रघु ने ऐसा क्या कर दिया जो आप'के परेशानी का करण बाना हुए हैं। मेरा लाडला ऐसा नहीं हैं जो कोई भी गलत काम करे।
राजेंद्र…सुरभि तुम इतना परेशान क्यों हों रहीं हों? हमारे बेटे ने कुछ गलत नहीं किया। सुरभि रघु की शादी ही मेरे परेशानी का करण बना हुआ हैं।
सुरभि…लड़की हम ढूंढ़ तो रहे है फिर रघु की शादी आप'के परेशानी का कारण कैसे बन सकता हैं। देर सवेर रघु की शादी हों जायेगा। आप इसके लिए परेशान न हों।
राजेंद्र…मैंने रघु के लिए कई लड़कियां देखा हैं। सभी लड़कियां वैसा हैं जैसा हमे रघु के लिए चाहिए। लेकिन एक बात मेरे अब तक समझ में नहीं आया। ऐसा क्या उन्हें पाता चल जाता हैं जिस'के करण हां कहने के बाद न कह देते हैं।
सुरभि…न कहा रहें है तो ठीक हैं हम रघु के लिए कोई ओर लड़की ढूंढ लेंगे।
राजेंद्र…बात लड़की ढूंढने की नहीं हैं मैं रघु के लिए ओर भी लड़की ढूंढ़ लूंगा लेकिन बात ये हैं बिना लड़के को देखे, बिना परखे कोई कैसे मना कर सकता हैं।
सुरभि…आप थोडा ठीक से बताएंगे आप कहना किया चहते हों।
राजेन्द्र…सुरभि आज तक जितनी भी लड़कियां देखा हैं। सभी लड़कियों को और उसके घर वालों को रघु की तस्वीर देख कर पसंद आ गया लेकिन अचानक उन्हें क्या हों जाता हैं? वो मना कर देते हैं।
सुरभि…ये आप क्या कह रहे हों? ऐसा कैसे हों सकता है? हमारा रघु तो सबसे अच्छा व्यवहार करता हैं उसमे कोई बुरी आदत भी नहीं हैं फिर कोई कैसे रघु को अपनी लड़की देने से मना कर सकता हैं?
राजेंद्र…यहीं तो मेरे समझ में नहीं आ रहा हैं। एक या दो बार होता तो कोई बात नहीं था। अब तक जितनी भी लड़की देखा हैं सभी के परिवार वाले पहले हां कहा फिर मना कर दिया।
सुरभि…उन लोगों ने मना करने के पिछे कुछ तो कारण बताया होगा।
राजेंद्र…उन्होंने जो कारण बताकर मना किया, उसे सुनकर मेरा खून खोल उठा तुमने सुना तो तुम्हें भी गुस्सा आ जायेगा।
सुरभि…उन्होंने ऐसा क्या बताया जिसे सुनकर अपको इतना गुस्सा आया।
राजेंद्र…उन्होंने कहा हमारे बेटे में बहुत से बुरी आदत है उसका बहुत से लड़कियों के साथ संबंध हैं। हम अपने लडकी की शादी आपके बेटे से करेंगे तो हमारी बेटी का जीवन बर्बाद हों जायेगा।
राजेंद्र की बाते सुन सुरभि गुस्से में आग बबूला हों गई और तेज आवाज में बोली…उनकी इतनी जुर्रत जो मेरे बेटे पर लांछन लगा रहें थें। मेरा बेटा सोने जैसा शुद्ध हैं। जैसे सोने में कोई अवगुण नहीं, वैसे ही मेरे लाडले में कोई अवगुण नहीं हैं।
जब सुरभि तेज आवाज में बोल रही थीं उसी वक्त सूकन्या सीढ़ी से ऊपर आ रहीं थीं। तेज आवाज को सुन सुकन्या, सुरभि के रूम के पास गईं दरवाज़ा बन्द था और अंदर से हल्की हल्की आवाजे आ रहा था इसलिए दरवाजे से कान लगाए अंदर हों रहीं बातों को सुनने लग गई। सुरभि के आवेश के वशीभूत होकर बोलने से राजेंद्र सुरभि को समझाते हुए बोला...इतने उत्तेजित होने की जरूरत नहीं हैं। मैं अच्छे से जनता हूं हमारे बेटे में कोई अवगुण नहीं हैं। लेकिन मैं ये नहीं जान पा रहा हूं ऐसा कर कौन रहा हैं हमारे बेटे को झूठा बदनाम करके किसी को क्या मिल जायेगा।
सुरभि…सुनो जी मुझे साजिश की बूं आ रही हैं कोई हमारे बेटे के खिलाफ साजिश कर रहा हैं। आप उस साजिश कर्ता को जल्दी ढूंढो मैं खुद उसे सजा दूंगी।
राजेंद्र…उसे तो मैं ढूंढूंगा ही फिर सजा भी दूंगा। तुमने साजिश का याद दिलाकर अच्छा किए मेरे एक और परेशानी का विषय यह साजिश शब्द भी हैं।
सुकन्या जो छुपकर बाते सुन रहीं थीं। साजिश की बात सुन सुकन्या के कान खडे हों गए फिर मन में बोली…जेठ जी के बातो से लग रहा हैं जेठ जी को हमारे बनाए साजिश की जानकारी हों गया होगा। ऐसा हुआ तो हम न घर के रहेगें न घाट के उनको सब बताना होगा। लेकिन पहले पूरी बाते तो सुन लू ।
सुरभि…आप कहना क्या चाहते हों खुल कर बोलो!
राजेंद्र…पिछले कुछ दिनों से मेरे विश्वास पात्र लोग एक एक करके गायब हों रहे हैं। जो मेरे लिए खबरी का काम कर रहे थे।
सुरभि…अपने गुप्तचर रख रखे हैं जो एक एक करके गायब हों रहे हैं। लेकिन अपको गुप्तचर रखने की जरूरत क्यो पड़ी।
राजेंद्र…सुरभि तुम भी न कैसी कैसी बाते करती हों, राज परिवार से हैं, इतने जमीन जायदाद हैं, इतनी सारी कम्पनियां हैं और विष्टि गुप्त संपत्ति भी हैं जिसे पाने के लिए लोग तरह तरह के छल चतुरी करेंगे। उनका पाता लगाने के लिए मैंने गुप्तचर रखा था लेकिन एक एक करके सभी न जानें कहा गायब हों गए उनमें से एक कुछ दिन पहले मेरे ऑफिस फोन कर कुछ बाते बताया था। बाकी की बाते मिल कर बताने वाला था लेकिन आया ही नहीं मुझे लगता हैं वह भी बाकी गुप्तचर की तरह गायब हों गया होगा।
सुकन्या छुप कर सुन रहीं थीं उसे ज्यादा तो नहीं कुछ कुछ बाते सुनाई दे रही थीं। गुप्तचर की बात सुन सुकन्या मन में ही बोली...ओ हों तो जेठ जी ने गुप्तचर रख रखे हैं लेकिन उनको गायब कर कौन रहा हैं? मुझे पूरी बाते सुननी चाहिए।
दरवाजे से कुछ आवाज सुनाई दिया इसलिए सुरभि का ध्यान दरवाजे की ओर गईं। तब सुरभि पति के मुंह पर उंगली रख चुप रहने को कहा फिर आ रही आवाज़ को ध्यान से सुनने लग गईं। हल्के हल्के चुड़िओ के खनकने की आवाज सुनाई दिया जिससे सुरभि को शक होने लग गई कोई दरवाजे पर खडा हैं। इसलिए शक को पुख्ता करने के लिए सुरभि बोली…दरवाजे पर कौन हैं? कोई काम हैं तो बाद में आना हम अभी जरूरी कम कर रहे हैं।
अचानक सुरभि की आवाज़ सुन सुकन्या सकपका गई और हिलने डुलने लग गई जिससे चूड़ियों की आवाज़ ओर ज्यादा होने लग गया। ज्यादा और स्पष्ट आवाज़ होने से सुरभि का शक यकीन में बदल गया। आवाज देते हुए सुरभि दरवाजे की ओर चल दिया। सुरभि की आवाज़ सुन सुकन्या मन में बोली...कोई छुपकर बाते सुन रहा हैं ये सुरभि को कैसे पाता चल गया। अब क्या करू भाग भी नहीं सकती। सुरभि ने पुछा तो उसे क्या जबाव दूंगी। जो भी पूछे मुझे संभाल कर जवाब देना होगा नहीं तो सुरभि के सामने मेरा भांडा फूट जायेगा।
सुरभि आ'कर दरवाज़ा खट से खोल दिया। सामने सुकन्या को खड़ी देख सुरभि बोली…छोटी तू कब आई कुछ काम था?
सुकन्या…दीदी मैं तो अभी अभी आप'से मिलने आई हूं लेकिन आप को कैसे पता चला की दरवाजे पर कोई आया हैं?
सुरभि…मुझे कैसे पाता चला ये जानकर तू क्या करेंगी ? तू बता मेरे रूम में कभी आती नहीं फिर आज कैसे आ गईं?
सुरभि की बाते सुन सुकन्या सकपका गई उसे समझ ही नहीं आ रहीं थी क्या ज़बाब दे, सुकन्या को सकपते देख सुरभि मुस्कुराते हुए बोली…आज आई हैं लेकिन गलत वक्त पर, अभी तू जा मैं तेरे जेठ जी के साथ व्यस्त हूं। तुझे बात करना हैं तो बाद में कर लेना।
फीकी सा मुस्कान लवों पे खिला न चाहते हुए भी सुकन्या चल दिया। जब तक सुकन्या रूम तक न पहुंच गई तब तक सुरभि खड़ी खड़ी सुकन्या को देख रहीं थी। सुकन्या रूम के पास पहुंचकर सुरभि की ओर देखा फ़िर रूम में घूस गई। सुरभि ने दरवजा बंद किया फिर मुस्कुराते हुए जाकर राजेंद्र के पास बैठ गई फ़िर बोली…छोटी छुप कर हमारी बाते सुन रहीं थीं इसलिए जो भी बोलना थोडा धीमे आवाज में बोलना ताकि बाहर खडे किसी को सुनाए न दे।
राजेंद्र…kyaaaaa सुकन्या लेकिन सुकन्या तो कभी हमारे रूम के अंदर तो छोड़ो रूम के आस पास भी नहीं आई फिर आज कैसे आ गई।
सुरभि…आप छोड़िए छोटी की बातों को उसके मन में क्या चलता हैं ये आप भी जानते हो और मैं भी जानती हूं। आप ये बताइए गुप्त चर ने आप'को किया बताया था। थोड़ा धीमे बोलिएगा तीसरा कोई सुन न पाए।
राजेंद्र…उसने बोला महल में से कोई मेरे और रघु के खिलाफ साजिश कर रहा हैं। मैं और रघु सतर्क रहूं।
सुरभि…महल से कोई साजिश कर रहा हैं। आप'ने उस धूर्त का नाम नहीं पुछा।
राजेंद्र…पुछा था! कह रहा था नाम के अलावा ओर भी बहुत कुछ बताना हैं, सबूत भी दिखाना हैं इसलिए फोन पर न बताकर मिलकर बताएगा।
सुरभि…अब तो वह लापता हों गया। नाम कैसे पता चलेगा?
राजेंद्र…यहीं तो समझ नहीं आ रहा। महल से कौन हों सकता हैं महल में तो हम दोनों भाई, तूम, सुकन्या हमारे बच्चे और कुछ नौंकर हैं। इनमें से कौन हों सकता हैं।
राजेंद्र से महल की बात सुन सुरभि गहन सोच विचार करने लग गई। सोचते हुए हावभाव पाल प्रति पाल बदल रहा था। सुरभि को देख राजेंद्र समझने की कोशिश कर रहा था, सुरभि इतना गहन विचार किस मुद्दे पर कर रहीं हैं। जब कुछ समझ न आया तो सुरभि को हिलाते हुए राजेंद्र बोला…सुरभि कहा खोई हुई हों?
सुरभि…आप'के कहीं बातों पर विचार कर रहीं हूं और ढूंढ रहीं हु आप के कहीं बातों का संबंध महल के किस शख्स से हों सकता हैं।
राजेंद्र…मैं भी इसी बात को लेकर परेशान हूं लेकिन किसी नतीजे पर पहुंच नहीं पाया।
सुरभि…जब आप लड़की देखने जाते थे आप अकेले जाते थे या आप के साथ कोई ओर भी होता था।
राजेंद्र…अकेले ही जाता था कभी कभी मुंशी को भी साथ ले जाया करता था। बाद में तुम्हे और रावण को बता दिया करता था।
सुरभि…ऐसा कोई करण हैं जिसका संबंध रघु के शादी से हो।
राजेंद्र…सुरभि करण है, बाबूजी का बनाया हुआ वसीयत, जिसका संबंध रघु के शादी से हैं।
सुरभि…वसीयत का संबंध रघु के शादी से कैसे हों सकता हैं। सभी संपत्ति तो बाबूजी ने आप दोनों भाइयों में बराबर बांट दिया था। फिर रघु के शादी का वसीयत से क्या लेना देना?
राजेंद्र…वसीयत का रघु के शादी से लेना देना हैं। हमारे पूर्वजों का गुप्त संपत्ति जिसका उत्तराधिकारी रघु की प्रथम संतान होगा और जो प्रत्यक्ष संपत्ति हैं उसका उत्तराधिकारी हम दोनों भाई हैं।
सुरभि...ओ तो ये बात हैं। मुझे लग रहा है अब तक जो कुछ भी हुआ, इसका करण कहीं न कहीं गुप्त संपत्ति ही हैं।
राजेंद्र…मतलब ये की कोई हमारे गुप्त संपत्ति को पाने के लिए साजिश कर रहा हैं। लेकिन गुप्त संपत्ति कहा रखा हैं ये राज मेरे आलावा कोई नहीं जनता, सिर्फ वसीयत के बारे में मैं, हमारा वकील दलाल और अब तुम जान गई हों। हम तीनों के अलावा किसी चौथे को गुप्त संपत्ति की जानकारी नहीं हैं।
आज के लिए इतना ही आगे की कहानी अगले अपडेट से जानेंगे यहां तक साथ बने रहने के लिय सभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद।
So surbhi ne apne Maan maj jiske prati shak hai unke Naam rajendra ke samne le liye but as usual jis tarah ki personality rajendra ki hai usey apne bhai aur us wakeel par pura bharusa hai but surbhi ke batane ke Baad usne Keh to diya ki wo satark rahega aur sab ko apne shak mai rakhega but kya wo aise karta hai ya nahi.Update - 7
सुरभि…मेरी शक की सुई घूम फिर कर इन दोनों पर आकर रूक रहीं हैं। मुझे लग रहा हैं अब तक जो कुछ भी हुआ हैं उसमें कहीं न कहीं रावण और दलाल में से किसी का हाथ हैं या फिर दोनों भी हों सकते हैं।
राजेंद्र…सुरभि तुम बबली हों गई हों तुम रावण पर शक कर रहीं हों , रावण मेरा सगा भाई हैं वो ऐसा कुछ नहीं करेगा, कुछ करना भी चाहेगा तो भी नहीं कर सकता क्योंकि वो वसीयत के बारे में कुछ भी नहीं जानता रहीं बात दलाल की वो हमारे परिवार का विश्वास पात्र बांदा हैं । उसके पूर्वज भी हमारे परिवार के लिए काम करता आया हैं।
सुरभि…आप भी न आंख होते हुऐ भी अंधा बन रहे हों। आंख मूंद कर आप सभी पर जो भरोसा करते हों, इसी आदत के कारण आज हम मुसीबत में फंसे हैं।
राजेंद्र…तो क्या अब मैं किसी पर भरोसा भी न करूं।
सुरभि…भरोसा करों लेकिन आंख मूंद कर नहीं, इस वक्त तो बिलकुल भी नहीं इस वक्त आप सभी को शक की दृष्टि से देखो नहीं तो बहुत बड़ा अनर्थ हों जाएगा।
राजेंद्र…अनर्थ तो हों गया हैं फिर भी मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकता तुम तो मेरी आदत जानते हों अब तुम ही बताओं मैं किया करूं।
सुरभि…आप समझ नहीं रहें हों इस वक्त जो परिस्थिती बना हुआ हैं। ये बहुत ही विकट परिस्थिती हैं। इस वक्त हम नहीं संभले तो बाद में हमे संभालने का मौका नहीं मिलेगा।
राजेंद्र…देर सवेर संभाल तो जाएंगे लेकिन मैं चाहकर भी अपनो पर शक नहीं कर सकता तुम समझ क्यों नहीं रहें हों। तुम कोई ओर रस्ता हों तो बताओं।
सुरभि…आप हमेशा से ही ऐसा करते आ रहे हों। आप'को कितनी बार कहा, ऐसे किसी पर अंधा विश्वास न करो लेकिन आप सुनते ही नहीं हों। आप'का अंधा विश्वास करना ही आप'के सामने विकट परिस्थिती उत्पन्न कर देता हैं।
राजेंद्र...सुरभि कहना आसान हैं लेकिन करना बहुत मुस्किल किसी पर उंगली उठाने से पहले उसके खिलाफ पुख्ता प्रमाण होना चाहिए। बिना प्रमाण के किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
सुरभि…मैं कौन सा आप'से कह रहा हूं, जा'कर उनके गिरेबान पकड़ो ओर कहो तुम'ने हमारे खिलाफ साजिश क्यों किया? मैं बस इतना कह रहीं हूं आप उन्हे शक के केंद्र में ले'कर उनके खिलाफ सबूत इकट्ठा करों।
राजेंद्र…ठीक हैं! तुम जैसा कह रही हों मैं वैसा ही करुंगा अब खुश ।
सुरभि…हां मैं खुश हूं ओर कुछ रह गया हों तो बोलों वो भी पूरा कर देती हूं।
राजेंद्र…अभी प्यार का खेल खेलना बाकी रह गया हैं उसे शुरू करे।
सुरभि…मैं नहीं जानती आप कौन से प्यार की खेल, खेलने की बात कर रहें हों। मुझे आप'के साथ कोई प्यार का खेल नहीं खेलना।
राजेंद्र…सुरभि तुम तो बड़ा जालिम हों ख़ुद मेनका बन मुझे रिझा रही थीं। मैं रीझ गया तो साफ साफ मुकर रहीं हों। मुझ पर इतना जुल्म न करों मैं सह नहीं पाऊंगा।
सुरभि उठ गई फिर पल्लू को सही करते हुए दूर हट गईं ओर बोली…आप'को जिस काम के लिए रिझाया था वो हों गया। प्यार का खेल खेलने का ये सही वक्त नहीं है। यह खेल रात में खेलना सही रहता हैं इसलिए आप रात्रि तक प्रतिक्षा कर लिजिए।
राजेंद्र उठा फिर सुरभि के पास जानें लग गया सुरभि पति को पास आते देख ठेंगा दिखाते हुए पीछे को हटने लग गई। सुरभि को पीछे जाते देख राजेंद्र सुरभि के पास जल्दी पहुंचने के लिए लंबे लंबे डग भरने लग गया राजेंद्र को लंबा डग भरते देख सुरभि मुस्कुराते हुए जल्दी जल्दी पूछे होने लग गई। पीछे होते होते जा'कर दीवाल से टिक गईं। राजेंद्र सुरभि को दीवाल से टिकते देख मुस्कुरा दिया फिर सुरभि के पास जा कमर से पकड़कर खुद से चिपका लिया ओर बोला…सुरभि अब कहा भाग कर जाओगी अब तो तुम्हारा चिर हरण हो'कर रहेगा। रोक सको तो रोक लो।
सुरभि राजेंद्र के पकड़ से छुटने की प्रयत्न करते हुए बोली…बड़े आए मेरा चिर हरण करने वाले छोड़ो मुझे, आप'को इसके अलावा ओर कुछ नहीं सूझता।
राजेंद्र...गजब करती हों तुम्हें क्यों छोडूं मैं नहीं छोड़ने वाला मैंने तो ठान लिया आज तो पत्नी जी को ढेर सारा प्यार करके ही रहूंगा।
राजेंद्र सुरभि को चूमने के लिए मुंह आगे बड़ा दिया सुरभि राजेंद्र के होटों पर ऊंगली रख दिया फिर बोली…हटो जी आप'का ये ढेर सारा प्यार मुझ पर बहुत भारी पड़ता हैं। मुझे नहीं चाहिएं आप'का ढेर सारा प्यार।
राजेंद्र…तुम्हें ढेर सारा प्यार न करू तो ओर किसे करू राजा महाराजा के खानदान से हूं। पिछले राजा महाराजा कईं सारे रानियां रखते थे। मेरी तो एक ही रानी हैं। जितना प्यार करना चाहूं करने देना होगा। नहीं तो दूसरी रानी ले आऊंगा ही ही ही
सुरभि...लगता हैं आप'का मन मुझ'से भर गया जो आप दूसरी लाने की बात कर रहे हों। जाओ जी मुझे आप'से बात नहीं करना हैं ले आओ दूसरी बीवी।
इतना बोल सुरभि मुंह फूला लिया ओर राजेंद्र का हाथ जो सुरभि के कमर पर कसा हुआ था उससे खुद को छुड़ाने लग गई। तभी कोई "राजा जी, राजा जी"आवाज देते हुए कमरे के बाहर खडा हों गया आवाज सुन राजेंद्र सुरभि को खुद से ओर कस के चिपका लिया फिर बोला…कौन हों मैं अभी विशेष काम करने में व्यस्त हूं।
शक्श…राजा जी माफ करना मैं धीरा हूं। मुंशी जी आए हैं कह रहें हैं आप'को उनके साथ कहीं जाना था।
धीरा के कहते ही राजेंद्र को याद आया। उसने मुंशी को किस काम के लिए बुलाया था ओर कहा जाना था। इसलिए सुरभि को छोड़ दिया फ़िर बोला…धीरा तुम जाओ ओर मुंशी को जलपान करवाओ मैं अभी आया।
धीरा…जी राजा जी।
इतना कह धीरा चल दिया। राजेंद्र निराश हो कपडे लिया फिर बाथरूम की ओर चल दिया। राजेंद्र को निराश देख सुरभि मुस्कुराते हुए बोली….क्या हुआ आप'ने मुझे छोड़ क्यों दिया। आप'को तो ढेर सारा प्यार करना था। प्यार करिए न देखिए मैं तैयार हूं।
राजेंद्र…जख्मों पर नमक छिड़काना तुम से बेहतर कोई नहीं जानता छिड़क लो जितना नमक छिड़कना हैं। अभी तो मैं जा रहा हूं लेकिन रात को तुम्हें बताउंगा।
राजेंद्र को ठेंगा दिखा सुरभि रूम से बाहर चल दिया। कुछ वक्त बाद राजेंद्र तैयार हों'कर रूम से बहार आ बैठक की ओर चल दिया। जहां मुंशी बैठे चाय की चुस्कियां ले रहा था। राजेंद्र को देख मुंशी खडा हों गया फिर नमस्कार किया। मुंशी को नमस्कार करते देख राजेंद्र मुस्करा दिया फिर बोला…मुंशी तुझे कितनी बार कहा तू मुझे देख नमस्कार न किया कर, सीधे आ'कर गले मिला कर पर तू सुनता ही नहीं तुझे ओर कितनी बार कहना पड़ेगा।
राजेंद्र जा'कर मुंशी के गले मिला फिर अलग होकर मुंशी बोला…राना जी ये तो आप'का बड़प्पन हैं। मैं आप'के ऑफिस का एक छोटा सा नौकर हूं ओर आप मालिक हों। इसलिए आप'का सम्मान करना मेरा धर्म हैं। मैं तो अपना धर्म निभा रहा हूं।
राजेंद्र…मुंशी तू अपना धर्मग्रन्थ अपने पास रख। तूने दुबारा नौकर और मालिक शब्द अपने मुंह से बोला तो तुझे तेरे पद से हमेशा हमेशा के लिए मुक्त कर दुंगा।
मुंशी…राना जी आप ऐसा बिल्कुल न करना नहीं तो मेरे बीबी बच्चे भूख से बिलख बिलख कर मर जायेंगे।
राजेंद्र…भाभी और रमन को भूखा नहीं मरने दूंगा लेकिन तुझे भूखा मर दुंगा अगर तूने दुबारा मेरे कहें बातो का उलघन किया। अब चल बहुत देर हों गया हैं। तू भी एक नंबर का अलसी हैं अपना काम ढंग से नहीं कर रहा हैं।
दोनों हंसते मुस्कुराते घर से चल दिया लेकिन कोई हैं जिसे इनका याराना पसंद नहीं आया और वो हैं सुकन्या जो धीरा के राजेंद्र को बुलाते सुनकर रूम से बाहर आ गई फिर राजेंद्र और मुंशी के दोस्ताने व्यवहार को देख तिलमिला गई ओर बोली…इन दोनों ने महल को गरीब खान बना रखा हैं एक नौकर से दोस्ती रखता हैं तो दूसरा महल के नौकरों को सर चढ़ा रखी हैं। एक बार महल का कब्जा मेरे हाथ आने दो सब को उनकी औकाद अच्छे से याद करवा दूंगी।
सुकन्या को अकेले में बदबड़ते देख सुरभि बोली…छोटी क्या हों गया, अकेले में क्यों बडबडा रहीं हैं?
सुकन्या…कुछ नहीं दीदी बस ऐसे ही।
सुरभि…तो क्या भूत से बाते कर रहीं थीं?
सुकन्या आ'कर सुरभि को सोफे पर बिठा दिया फिर खुद भी बैठ गईं। सुकन्या के इस व्यवहार से सुरभि सुकन्या को एक टक देखने लग गई सुरभि ही नहीं रतन और धीरा भी ऐसे देख रहे थे जैसे आज कोई अजूबा हों गया हों। हालाकि यह अजूबा इससे पहले सुकन्या कर चुका था ओर सभी को सोचने पर मजबूर कर चुकी थीं। इसलिए सुकन्या का आदर्श व्यवहार करना किसी के गले नहीं उतर रहा था। सभी को ताकते देख सुकन्या रतन और धीरा से बोली…क्या देख रहें हों तुम्हें कोई काम नहीं हैं जब देखो काम चोरी करते रहते हों जाओ अपना अपना काम करों।
सुकन्या कह मुस्कुरा दिया फिर इशारे से ही दोनों को जानें के लिए दुबारा कहा। तब दोनों सिर झटककर चल दिया। दोनों के जाते ही सुरभि बोली…छोटी तेरा न कुछ पाता ही नहीं चलता तू कभी किसी रूप में होती हैं तो कभी किसी ओर रूप में समझ नहीं आता तेरे मन में किया चल रही हैं।
सुकन्या…दीदी आप सीधा सीधा बोलिए न मैं गिरगिट हूं ओर गिरगिट की तरह पल पल रंग बदलती हूं।
सुरभि...मैं भला तुझे गिरगिट क्यों कहने लगीं तू तो एक खुबसूरत इंसान हैं जो अपनें व्यवहार से सभी को सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
सुकन्या…दीदी आप मुझे ताने मार रहीं हों मार लो ताने, मैं काम ही ऐसा करती हूं।
सुरभि…मैं भला क्यो तने मरने लगीं? तू छोड़ इन बातों को, ये बता तू आज मेरे रूम मे कैसे आ गई? इससे पहले तो कभी नहीं आई।
सुकन्या…अब तक नहीं आई ये मेरी भूल थीं। अब मैं रोज आप'के रूम में आऊंगी ओर आप'से ढेर सारी बातें करूंगी।
सुरभि…तुझे रोका किसने हैं तू कभी भी मेरे रूम में आ सकती हैं जितनी मन करे उतनी बाते कर सकती हैं।
ऐसे ही दोनों बाते करने लग गए। जब दो महिलाएं एक जगह बैठी हों तो उनके बातों का सिलसिला कभी खत्म ही नहीं होता। दोनों देवरानी जेठानी को बातों में मशगूल देख धीरा बोला…काका आज इस नागिन को हों क्या गया? रानी मां से अच्छा व्यवहार कर रहीं हैं। अच्छे से बाते कर रहीं हैं।
रतन…धीरे बोल नागिन ने सुन लिया तो जमा किया हुआ सभी ज़हर हम पर ही उगल देगी। उनके ज़हर का काट किसी के पास नहीं हैं। हमारे पास तो बिल्कुल नहीं!
धीरा…काका सही कह रहे हों, न जानें कब महल में ऐसी ओझा ( सपेरा) आयेगा जो इस नागिन के फन को कुचलकर इसके ज़हर वाली दांत को तोड़ सकें।
दोनों बाते करने मैं इतने मग्न थे की इन्हें पाता ही नहीं चला कोई इन्हें आवाज दे रहा था जब ध्यान गया तो उसे देख दोनों सकपका गए फ़िर डरने भी लगें। रतन किसी तरह डर को काबू किया ओर बोला…छोटी मालकिन आप'को कुछ चाहिए था तो आवाज दे दिया होता। यह आने का कष्ट क्यों किया?
सुकन्या…आवाज़ दिया तो था। धीरा एक गिलास पानी लेकर आ लेकीन सुनाई देता तब न, सुनाई देता भी कैसे, दोनों कामचोर बातों में जो माझे हुए थे। अच्छा ये बताओ तुम दोनों किस नागिन की बात कर रहें थें? कौन ओझा किस नागिन की फन कुचल, ज़हर वाली दांत तोड़ने वाला हैं।
सुकन्या की बाते सुन दोनों एक दूसरे का मुंह ताकने लग गए ओर सोचने लगे अब क्या जवाब दे? एक दूसरे को ताकते देख सुकन्या बोली…तुम दोनों एक दूसरे को तकना छोड़ कुछ बोल क्यों नहीं रहें? मुंह में जुबान नहीं हैं। (सुरभि की ओर देखकर) दीदी ने तुम सभी को सिर चढ़ा रखा हैं काम के न काज के दुश्मन अनाज के अब जल्दी बोलों किस बारे में बात कर रहें थे।
रतन समझ गया सुकन्या पूरी बात नहीं सुन पाया इसलिए जानना चाहती हैं। तो रतन खुद का बचाव करने के लिए एक मन घड़ंत कहानी बना बताने लग गया।
"छोटी मालकिन धीरा बता रहा था उसने किसी से सुना हैं यह से दुर किसी के घर में एक नागिन निकला हैं जिसकी जहर वाली दांत निकलने के लिए कोई ओझा पकड़ कर ले गया। हम दोनों उस नागिन की बात कर रहें थे न जाने अब कैसे ओझा उस नागिन की ज़हर वाली दांत तोड़ेगा।
रतन कि बात सुन धीरा समझ गया। एक झूठी कहानी बना सुकन्या को सुनाकर झांसा दे रहा हैं। इसलिए धीरा भी रतन के हां में हां मिलाते हुए बोला...हां हां छोटी मालकिन मैं काका को उस नागिन और उसकी ज़हर की बात कर रहा था। आप को किया लगा, हम महल की बात कर रहे थे जब महल में कोई नागिन निकली ही नहीं, तो हम महल में मौजुद नागिन की ज़हर निकलने की बात क्यो करेंगे?
सुकन्या…अच्छा अच्छा ठीक हैं अब ज्यादा बाते न बनाओ, जल्दी से दो गिलास पानी ले'कर आओ काम चोर कहीं के।
सुकन्या कहकर चली गईं। धीरा और रतन छीने पर हाथ रख धकधक हों रहीं धड़कन को काबू करने लग गए। बे तरतीब चल रही धड़कने कुछ काम हुआ तब रतन बोला...धीरा जल्दी जा नागिन को पानी पिला आ नहीं तो नागिन फिर से ज़हर उगलने आ जायेगी।
धीरा दो गिलास ले'कर एक प्लेट पर रखा फिर पानी भरते हुए बोला…काका आज बाल बाल बच गए। छोटी मालकिन हमारी पूरी बाते सुन लिया होता। तो अपने जहर वाली दांत हमे चुबो चूबो कर तड़पा तड़पा कर मार डालती।
रतन…बच तो गए हैं लेकीन आगे हमे ध्यान रखना हैं तू जल्दी जा ओर पानी पिलाकर आ लगता हैं छोटी मालकिन बहुत प्यासा हैं।
धीरा जा'कर दोनों को पानी दिया फ़िर किचन मे चला गया ओर अपने काम में लग गया। ऐसे ही दिन बीत गया। राजेन्द्र और रावण दोनों भाई अभी तक घर नहीं लौटे थे। न जानें दोनों को घर लौटने में ओर कितना देर लगने वाला था। इसलिए बिना वेट किए सुरभि, सुकन्या रघु और अपश्यु खाना खा'कर अपने अपने रूम में चले गए। सुकन्या रूम में आ'कर दो पल स्थिर से नहीं रुक पा रहीं थीं। उसके मन में हल चल मची हुई थी। साथ ही पेट पर वजन भी पड़ रहा था क्योंकि दिन में सुनी सुरभि और राजेंद्र की बाते ओर अभी खाया खाना, दोनों मिलकर बदहजमी का कारण बनता जा रहा था। बदहजमी से छुटकारा पाने का उसे एक ही रस्ता दिखा, दिन में सुनी बाते पति को बता दिया जाएं। लेकिन रावण अभी तक घर नहीं लौटा था इसलिए सुकन्या परेशान हों'कर बोली…जिस दिन इनसे जरूरी बात करनी होती हैं। उसी दिन ये लेट आते हैं। ना जानें कब आयेंगे। ये बाते ओर कितनी देर तक मेरे पेट में हल चल मचाती रहेंगी कब तक इन बातों का बोझ ढोती रहूंगी।
सुकन्या अकेले अकेले बडबडा रही थीं ओर ये सोच टहल रहीं थीं शायद टहलने से बेचैनी थोड़ा कम हों जाएं लेकिन फायदा कुछ हों नहीं रहा था। रावण और राजेंद्र दोनों एक के बाद एक महल लौट आए। नौकरों को खाना लगाने को बोल हाथ मुंह धोने रूम में चले गए। रावण को देख सुकन्या एक चैन की स्वास लिया फिर बोली…आप आज इतने लेट क्यों आए? आप से कितनी जरूरी बात करना था ओर आप आज ही लेट आए। जिस दिन आपसे जरूरी बात करना होता हैं आप उसी दिन लेट आते हों। बोलों ऐसा क्यों करते हों?
रावण…अजीव बीबी हो खाना खाया कि नहीं खाया ये पुछने से पहले शिकायत करने लग गईं। तुम अपना दुखड़ा ही सुना दो आज तुम्हारे बातों से ही पेट भरा लुंगा।
रावण की बाते सुन सुकन्या मुंह बना लिया फ़िर बोली…आप तो ऐसे कह रहें हों जैसे मुझे आप'की भूख की परवा नहीं जाइए पहले खाना खा'कर आइए फिर बात करेगें।
रावण...अरे तुम तो रूठने लग गईं। अच्छा बताओ किया कहना चाहते हों। मैं भुख बर्दास्त कर सकता हूं लेकिन तुम मुझसे रूठ जाओ ये मुझे बर्दास्त नहीं।
इतना कह रावण कान पकड़ लिया। जिससे हुआ ये सुकन्या के चहरे पर खिला सा मुस्कान आ गया। मुस्कुराते हुए सुकन्या बोली...आप पहले खाना खाकर आइए फिर बात करते हैं।
रावण मुस्कुरा दिया फिर हाथ मुंह धोने बाथरूम चला गया। ईधर राजेंद्र रूम में पहुंचा, सुरभि बेड पर पिट टिकाए एक किताब पढ़ रहीं थीं। राजेन्द्र को देख किताब बंद कर साइड में रख दिया फिर बोली....आप आ गए इतनी देर कैसे हो गईं?
राजेन्द्र…कुछ जरूरी काम था इसलिए देर हो गया। तुम ये कौन सी किताब पढ़ रहीं थीं?
किताब के बरे मे जानें की ललक देख सुरभि को खुराफात सूजा इसलिए मंद मंद मुस्कुराते हुए बोली…कामशास्त्र पढ़ रहीं थी। किताब के बरे मे ओर कुछ जानना हैं।
राजेन्द्र…ओ ये बात हैं तो चलो फिर पहले अधूरा छोड़ा कम पूरा कर लेता हूं फिर खान पीना कर लूंगा।
सुरभि…अधूरा कम बाद में पूरा कर लेना अभी जा'कर अपना ताकत बड़ा कर आइए आज अपको बहुत ताकत की जरूरत पड़ने वाला हैं।
राजेन्द्र…लगाता हैं आज रानी साहिबा मूढ़ में हैं।
सुरभि…आप'की रानी साहिबा तो सुबह से ही मुड़ में हैं ओर आप'का तो कोई खोज खबर ही नहीं था।
राजेंद्र…अब आ गया हू अच्छे से खोज खबर लूंगा लेकिन पहले भोजन करके ताकत बड़ा लू।
दोनों एक दुसरे को देख मुस्कुरा दिया फिर राजेन्द्र हाथ मुंह धो'कर कपडे बादल खाना खाने चल दिया। जहां रावण पहले से ही मौजूद था दोनों भाई दिन भर की कामों के बारे में बात करते करते भोजन करने लग गए। भोजन करने के बाद एक दूसरे को गुड नाईट बोल अपने अपने कमरे में चले गए। सुकन्या रावण की प्रतिक्षा में सुख रही थी। रावण के आते ही शुरू हों गई
सुकन्या…भोजन करने में कितना समय लगा दिया। इतनी देर तक क्या कर रहें थें?
राजेन्द्र…दादाभाई के साथ दिन भर के कामों के बारे में बात कर रहा था इसलिए खाना खाने में थोड़ा ज्यादा वक्त लग गया। तुम बताओ क्या कहना चाहते हों?
सुकन्या…मुझे लगता हैं सुरभि और जेठ जी को हमारे साजिश के बारे में पता चल गया हैं।
ये सुन रावण के पैरों तले जमीन खिसक गया। उसे अपने बनाए साजिश का पर्दा फाश होने का डर सताने लग गया। जिसे छुपाने के लिए न जानें कितने कांड रावण ने किया फिर भी हूआ वोही जिसका उसे डर था लेकिन इतनी जल्दी होगा उसे भी समझ नहीं आ रहा था। रावण का मन कर रहा था अभी जा'कर अपने भाई भाभी और रघु को मौत के घाट उतर दे लेकिन फिर खुद को नियंत्रण कर बोला... हमारे बनाए साजिश का पर्दा फाश हों चुका हैं। तुम्हें कैसे पता चला? ऐसा हुए होता तो दादा भाई अब तक मुझे मार देते या फ़िर जेल में डाल देते।
सुकन्या…इतनी सी बात के लिए जेठ जी भला आपको क्यो मरने लगे?
रावण…इतनी सी बात नहीं बहुत बडी बात हैं। तुम ये बताओ तुम्हें कैसे पाता चला?
सुकन्या…आप'के जानें के बाद मैं कुछ काम से निचे गई जब ऊपर आ रही थीं तभी मुझे सुरभि के कमरे से तेज तेज बोलने की आवाज़ सुनाई दिया मैं उनके कमरे के पास गई तो मुझे दरवजा बंद दिखा। मैं वापस मुड़ ही रहीं थीं की मुझे उनकी बाते फिर सुनाई दिया जिसे सुनकर मेरे कदम रुख गए और मैं उनकी बाते सुने लग गई। सुरभि कह रही थीं आप उनके बातों पर ध्यान मत देना मुझे लगता हैं कोई मेरे बेटे के खिलाफ साजिश कर रहा हैं फिर भाई साहब ने जो बोला उसे सुनकर मेरे कान खडे हों गए ओर आगे जो जो सुकन्या छुप कर सूना था एक एक बात बता दिया जिसे सुनकर रावण बोला...ये तो बहुत ही विकट परिस्थिति बन गया हैं। मुझे लगता हैं दादा भाई को पूरी बाते पता नहीं चला नहीं तो मैं आज महल में नहीं जेल में बंद होता या फिर दाद भाई मेरा खून कर देते।
सुकन्या…आप क्या कह रहे हो? जेठ जी आप'का खून क्यों कर देते? हम दोनों तो सिर्फ़ महल और सभी संपत्ति अपने नाम करवाना चाहते हैं। इसमें खून करने की बात कहा से आ गई जेठ जी आप'को जेल भी तो भिजवा सकते हैं।
रावण…सुकन्या तुम नहीं जानती मैंने जो कर्म कांड किया हैं उसे जानने के बाद दादा भाई मुझे जेल में नही डालते बल्कि मेरा कत्ल कर देते।
सुकन्या…आप कहना क्या चाहतें हो? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। लेकिन मैं इतना तो समझ गई हूं आप'ने मुझ'से बहुत कुछ छुपा रखा हैं। बताइए न आप क्या छुपा रहे हों?
रावण…हां बहुत कुछ हैं जो मैंने तुम्हे नहीं बताया। तुम्हें किया लगता हैं आधी सम्पत्ति पाने के लिए दादाभाई के साथ विश्वास घात करूंगा, नहीं सुकन्या मैं कुछ ओर पाने के लिए दादा भाई के साथ विश्वास घात कर रहा हूं।
सुकन्या…मुझे जहां तक जानकारी हैं हमारे पास इस संपत्ति के अलावा ओर कुछ नहीं हैं जो आधा आधा आप दोनों भाइयों में बांटा हुआ हैं। तो फ़िर ओर रह ही क्या गया? जिसे आप पाना चाहते हों।
रावण…सुकन्या हमारे पास गुप्त संपत्ति हैं जिसे पा लिया तो मैं बैठे बैठे ही दुनियां का सबसे अमीर आदमी बन जाऊंगा।
गुप्त संपत्ति और दुनियां की सबसे अमीर होने की बात सुन सुकन्या अचंभित हों गई। एक पल के लिए सुकन्या की आंखें मोटी हों गई। जैसे लालच उस पर हावी हों रहा हों एकाएक सुकन्या सिर को तेज तेज झटका देने लग गई। ये देख रावण बोला...सुकन्या खुद पर काबू रखो तुम जानकार अनियंत्रित हों जाओगी इसलिए मैं तुम्हें नहीं बता रहा था।
सुकन्या…कैसे खुद पर नियंत्रण रख पाऊं न जानें आप कैसे खुद पर नियंत्रण रखें हुए हैं।
रावण...खुद पर नियंत्रण रखना होगा नहीं तो हमारे किए कराए पर पानी फिर जायेगा फ़िर गुप्त सम्पत्ति हमारे हाथ से निकल जायेगा। जिसकी जानकारी सिर्फ दादाभाई को हैं। जब तक मैं जानकारी न निकल लेता तब तक खुद पर नियंत्रण रखना होगा।
सुकन्या…गुप्त संपत्ति का राज सिर्फ जेठ जी जानते हैं। तो फिर आप को कैसे पता चला?
रावण…गुप्त संपत्ति का राज सिर्फ दादाभाई ही जानते हैं लेकिन उस संपत्ति का एक वसियत बनाया गया था। जिसके बारे में दादा भाई और हमारा वकील दलाल जानता हैं। दलाल मेरा बहुत अच्छा दोस्त हैं। एक दिन बातों बातों में दलाल ने मुझे गुप्त संपत्ति के वसियत के बारे में बता दिया। उससे गुप्त सम्पत्ति कहा रखा हैं पूछा तो उसने कहा उसे सिर्फ वसीयत की जानकारी है गुप्त संपत्ति कहा रखा है वो नहीं जनता तब हम दोनों ने मिलकर गुप्त संपत्ति का पता ठिकाना जानने के लिए साजिश रचना शुरू कर दिया।
रावण ने आगे कहा…हमारे साजिश का पहला निशाना बना रघु , वसियत के अनुसार रघु की पहली संतान गुप्त संपत्ति का मूल उत्तराधिकारी होगा। इसलिए मैं रघु की शादी रोकने के लिए जहां भी दादाभाई लड़की देखते उनको अपने आदमियों को भेजकर डरा धमका कर शादी के लिए माना करवा दिया करता था। जो नहीं मानते उनको रघु में बहुत सारे बुरी आदतें हैं, ऐसी झूठी खबर दिया करता था। ये जानकर लड़की वाले खुद ही रिश्ता करने से मना कर देते थे।
रावण...मैंने दादाभाई पर भी नज़र रखवाया। जिससे मुझे पाता चल जाता, दादाभाई कब किस लड़की वालों से मिलने गए ऐसे ही नज़र रखवाते रखवाते मुझे दादाभाई के रखे गुप्तचर के बरे में पाता चल गया फिर मैं उन गुप्तचरों को ढूंढूं ढूंढूं कर सभी को मार दिया। उन्हीं गुप्त चारों में से किसी ने दादाभाई को साजिश के बारे में बताएं होगा और सबूत भी देने की बात कहा होगा।
रावण की बाते सुन सुकन्या अचंभित रह गईं उसे समझ ही नही आ रहा था क्या बोले सुकन्या सिर्फ रावण का मुंह ताक रहीं थीं। सुकन्या को तकते देख रावण बोला…सुकन्या क्या हुआ सदमे में चल बसी हों या जिंदा हों।
सुकन्या…जिन्दा हूॅं लेकिन आप'से नाराज़ हूं आप'ने इतना बड़ा राज मुझ'से छुपाया और इतना कुछ अकेले अकेले किया मुझे बताया भी नहीं।
रावण…गुप्त संपत्ति प्राप्त कर मैं तुम्हें उपहार में देना चाहता था लेकिन समय का चल ऐसा चला की गुप्त संपत्ति प्राप्त करने से पहले ही तुम्हें राज बताना पड़ रहा हैं मैं अकेला नहीं हूं मेरे साथ मेरा दोस्त दलाल भी सहयोग कर रहा हैं।
सुकन्या…अब मैं आप'के साथ हूं आप जैसा कहेंगे मैं करूंगी। हमे आगे क्या करना चाहिए? जब साजिश की बात खुल गई हैं। तो देर सवेर जेठ जी साजिश करने वाले को ढूंढ लेंगे। तब हमारा क्या होगा?
रावण…दादाभाई को साजिश का भनक लग गया हैं तो दादाभाई चुप नहीं बैठने वाले इसलिए हमें यही रुक जाना पड़ेगा फिर आगे चलकर नए सिरे से शुरू करना होगा।
सुकन्या…ऐसे तो रघु की शादी हों जायेगा फिर गुप्त संपत्ति का मूल उत्तर अधिकारी भी आ जाएगा। ऐसा हुआ तो गुप्त सम्पत्ति हमारे हाथ से निकल जायेगा।
रावण…अभी के लिए हमें रुकना ही पड़ेगा नहीं तो हमारा भांडा फुट जायेगा। आगे चल कर मैं कोई न कोई रस्ता ढूंढ लुंगा।
सुकन्या…ठीक हैं। बहुत रात हों गया हैं अब चलकर सोते हैं।
दोनों साथ में लेट गए रावण थका हुआ था। इसलिए लेटने के कुछ वक्त बाद नींद की वादी में खो गया लेकिन सुकन्या को नींद नहीं आ रहीं थीं। एक हाथ सिर पे रख सुकन्या मन ही मन बोली...मैंने थोड़ा लालची होने का ढोंग क्या किया अपने मुझे सभी राज बता दिया। मुझे उम्मीद नहीं था आप इतने लालची निकलोगे मुझे तो लगता हैं मैं एक गलत इंसान से शादी कर लिया। पहले जान गया होता तो आप से शादी ही न किया होता। आप इसी लिए मुझे बार बार दिखावे की जिंदगी जीने को कह रहे थें। लेकिन आप नहीं जानते मैं दिखावे की जिंदगी ही जी रहीं हूं। न जानें कब तक ओर मुझे बुरे होने का ढोंग करना पड़ेगा। अब मुझसे ओर नहीं होता हे भगवान कुछ ऐसा कर जिससे मुझे दिखावे की जिंदगी न जीना पड़े।
कुछ वक्त तक ओर खुद के बरे मे सोच सोच कर सुकन्या करवटें बदलती रहीं फिर सो गई। उधर सुरभि और राजेंद्र काम शास्त्र की कलाओं को साधने में लगे हुए थे। दोनों काम कलां में मग्न थे और महल के दूसरे कमरे में बहुत से राज उजागर हुआ और दफन भी हों गया। जिसकी भानक किसी को नहीं हुआ।
आगे क्या क्या होने वाला हैं इसके बरे में आगे आने वाले अपडेट में जानेंगे आज के लिए इतना ही। यह तक साथ बने रहने के लिए सभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद
Subah subah apasyu ki class le li gayi jaha rajendra ne usey sahi mai data to wahi ravan ka datna sirf ek natak tha but sukanya ke bole gaye bol sach they ya wo bhi natak hi tha ye pata nahi chala pa raha hai.Update - 8
रात के तीसरे प्रहर में अचानक रावण की नींद टूट गया। बेड के बगल में रखा पानी का जग उठा पीना पिया फिर लेट गया। एक बार नींद टूटने के बाद दुबारा नींद आ नहीं रहा था। तो लेटे लेटे रावण कुछ सोच रहा था। सोचते सोचते अचानक आज सुकन्या से हुई बातों को सोचने लग गया। दादाभाई को आगर सच पाता चल गया तो क्या हों सकता हैं? आगर पाता नहीं चला तो कैसे बचा जाए जिससे दादाभाई को पता न चले? इसी पर विचार करते हुए रावण कभी इस करवट तो कभी उस करवट, करवाटें बदल रहा था। उसका मन विभिन्न संभावनाओं पर विचार कर रहा था। उसे आगे किया करना चाहिए। जिससे उसके रचे साजिश का पर्दा फाश होने से बचा रह सके। रावण यह भी सोच रहा था। उससे कहा चूक हों गया। जब उसे कोई रस्ता नज़र नहीं आया तो वकील दलाल को इस विषय में बताना सही समझा। इसी सोचा विचारी में रात्रि के अंतिम पहर तक जागता रहा फ़िर सो गया। सुबह उठ कर बैठें बैठे सुकन्या अंगड़ाई ले रही थीं तभी उसकी नज़र घड़ी पर गईं, समय देखकर सुकन्या अंगड़ाई लेना भूल गई ओर बोली...आज फिर लेट हों गयी न जानें कब जल्दी उठने के नियम में बदलाव होगा। मैं तो तंग आ गईं हूं।
सुकन्या…सुनो जी जल्दी उठो कब तक सोते रहोगे।
रावण…कुनमुनाते हुए अरे क्या हुआ सोने दो न बहुत नींद आ रहा हैं।
सुकन्या...रात भार सोते रहें उससे भी जी नहीं भरा जल्दी उठो सुबह हों गई हैं। देर हों गया तो दोपहर तक भूखा रहना पड़ेगा।
रावण उठकर बैठा फिर जम्हाई लेकर बोला...इतनी जल्दी सुबह हों गया अभी तो सोया था।
सुकन्या…नींद में ही भांग पी लिया या रात का नशा अभी तक उतरा नहीं जल्दी उठो हम लेट हों गए हैं।
इतना कह सुकन्या कपड़े लेकर बाथरूम में चली गई। रावण बैठ बैठें आंखे मलता रहा। सुकन्या के बाथरूम से निकलते ही रावण बाथरूम में फ्रैश होने चला गया। रावण के आते ही दोनों नाश्ता करने चल दिया। रावण जाते समय ऐसे चल रहा था जैसे किसी ने उस पर बहुत बड़ा बोझ रख दिया हों। नींद पूरा न होने का असर रावण के चहरे पर दिख रहा था। रावण डायनिंग टेबल पर ऐसे बैठा था जैसे कोई पुतला हों। ये देख राजेंद्र बोला...रावण ऐसे क्यों बैठा हैं जैसे कोई पुतला बैठा हों। तेरा तबियत तो ठीक हैं।
रावण…दादाभाई तबियत ठीक हैं रात को देर से सोया था तो नींद पूरा नहीं हुआ इसलिए ऐसा लग रहा हैं जैसे शरीर में जान ही नहीं हैं।
सुरभि और राजेंद्र एक दूसरे को देख मुस्कुरा दिया फिर नाश्ता सर्व होते ही नाश्ता करने लग गए। नाश्ता करते करते एक नज़र अपश्यु को देखा फ़िर राजेंद्र बोला...अपस्यू बेटा इस सत्र में पास हों जाओगे या उसी कॉलेज में ढेरा जमाए बैठे रहना हैं।
अपश्यु का ध्यान नाश्ते पर ही था। इसलिए बड़े पापा की बाते सून हड़बड़ा गया फिर बोला…बड़े पापा पूरी कोशिश कर रहा हूं इस बार पास हों जाऊंगा।
राजेंद्र...कोशिश कहां कर रहें हों कॉलेज के अदंर या बहार। तुम कॉलेज के अदंर तो कदम रखते नहीं, दिन भर आवारा दोस्तों के साथ मटरगास्ती करते फिरते हों, तो पास किया ख़ाक हों पाओगे।
अपश्यु…बड़े पापा मैं रोज कॉलेज जाता हूं। कॉलेज के बाद ही दोस्तों के साथ घूमने जाता हूं।
राजेंद्र…सफेद झूठ तुम घर से कॉलेज के लिए निकलते तो हों लेकिन पहुंच कहीं ओर जाते हों। तुम्हारा कॉलेज घर से इतना दूर भी नहीं हैं जो तुम दिन भर में कॉलेज पहुंच ही नहीं पाते हों।
खुद की हरकतों की पोल खुलने से अपश्यु सिर झुका लिया। ये देख रावण बोला...अपश्यु ये क्या सुन रहा हूं? तुम कॉलेज न जाकर कहीं ओर जाते हों? बोलों कहा जाते हों?
अपश्यु…पापा कॉलेज ही जाता हूं लेकिन कभी कभी बंक करके दोस्तों के साथ घूमने चला जाता हूं।
राजेन्द्र…आगर तुम कभी कभी कॉलेज बंक करते हों तो प्रिंसिपल साहब ऐसा क्यों कह रहें थें तुम बहुत ही कम कॉलेज जाते हों। बोलों क्या उन्होंने झूठ बोला है।
अपश्यु बोला कुछ नहीं सिर्फ सिर झुकाए बैठा रहा ये देख सुकन्या बोली...अपश्यु चुप क्यों हैं कुछ बोल, कॉलेज के बहाने कहा जाता हैं? बेटा पढाई से मुंह मोड़ेगा तो ग्वार बनकर रह जायेगा। माना की पढाई के साथ घूमना फिरना भी जरूरी हैं। उसके लिए कॉलेज बंक क्यों करना? हफ्ते में एक छुट्टी मिलता हैं उस दिन जीतना घूमना हैं घूम लिया कर।
अपश्यु का सिर निचे का नीचे ही रहा एक पल के लिए भी नहीं उठा सिर नीचे किए ही मन ही मन प्रिंसिपल को गाली दिए जा रहा था। अपश्यु का सिर नीचे देख रावण बोला... तुम सिर झुकाए बैठे हों इसका मतलब दादा भाई जो कह रहे हैं सच कह रहें हैं। अपश्यु कान खोल कर सुन लो आज के बाद एक भी दिन कॉलेज बंक किया तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा।
अपश्यु…जी पापा।
राजेन्द्र...अपश्यु, बेटा हों सकता है तुम्हें हमारी बातों का बुरा लग रहा होगा। हमारी बातों पर गौर करना हम तुम्हारे भाले के लिए कह रहें हैं।
रघु अपश्यु के बगल में ही बैठा था। अपश्यु को सिर झुकाए बैठा देख उसके कंधे पर हाथ रखा फ़िर बोला...छोटे कॉलेज लाईफ को इंजय करना चाहिए लेकिन इतना भी नहीं की फ्यूचर ही खराब हों जाएं अभी तुम मन लगाकर पढ़ाई नहीं करोगे तो आगे चलकर तुम्हें ही दिक्कत होगा।
रघु की बाते सून अपश्यु एक नज़र रघु को देखा फ़िर चुप चाप नाश्ता करने लग गया। सुरभि उठकर अपश्यु के पास गया फिर उसके सिर पर हाथ फेर दिया। अपश्यु नज़र उठा बड़ी मां को देखा फ़िर सिर झुका लिया तब सुरभि एक निवाला बना अपस्यू को खिलाया ओर बोला...आप दोनों भाई भी न खाते वक्त क्या, कोई डांटता हैं? डांटना ही था तो नाश्ते के बाद डांट लेते लेकिन नही नाश्ता करते वक्त ही डटने का मन जो बना लिया था।
रावण... भाभी..!
सुरभि...बहुत डांट लिया आगे कोई कुछ नहीं बोलेगा चुप चाप नाश्ता करके ऑफिस जाओ ओर अपश्यु, बेटा ऐसा क्यों करता हैं जिससे तुझे बार बार डांट सुनना पड़ता हैं। अब तू बड़ा हों गया हैं ओर कब तक नसमझो जैसा हरकते करता रहेगा। आगे से घर पर शिकायत नहीं आना चाहिए। समझ गया न!
अपश्यु... जी बड़ी मां फ़िर मन में बोला...प्रिंसिपल आज तो तू गया साले पिछली मार भुल गया जो आज फ़िर शिकायत लेकर घर पहुंच गया।
सभी फिर से नाश्ता करने लग गया। नाश्ता करने के बाद राजेंद्र बोला...रघु आज तू मेरे साथ ऑफिस चलेगा कुछ काम हैं।
रघु बिना किसी सवाल ज़बाब के हां बोल दिया फिर रावण बोला...दादाभाई आप रघु को अपने साथ ले जाइए मुझे जानें में थोडा लेट होगा।
राजेंद्र…ठीक हैं।
इतना कह रावण उठ गया फिर रूम को चल दिया। रावण रूम में आकर फिर से लेट गया रावण को लेटा देख सुकन्या बोली...क्या हुआ आज ऑफिस नहीं जाना जो फ़िर से लेट रहें हों।
रावण…थोड़ा सा ओर नींद लेने के बाद ही ऑफिस जाउंगा।
सुकन्या…मैं भी आ रहीं हूं मुझे भी थोडी देर ओर सोना हैं।
रावण...आओ दोनों चिपक कर सो जाएंगे। मस्त नींद आएगा।
सुकन्या...ज्यादा मस्ती चढ़ रहा हैं। चुप चप अकेले सो जाओ मैं चली बहार।
इतना कह सुकन्या रूम से बहार चली गई। राजेंद्र ऑफिस जानें की तैयारी कर लिया सुरभि से ब्रीफकेस लेते हुए बोला…सुरभि मैं एक घंटे में ऑफिस से लौट आऊंगा तुम तैयार रहना हम कलकत्ता चल रहे हैं।
दोनों की एकलौती बेटी पुष्पा कलकत्ता में रहकर पढाई कर रहीं थीं। इसलिए कलकत्ता जानें की बात सुन सुरभि खुश हों गईं ओर बोली...मैं भी सोच रही थी आप से कलकत्ता चलने को कहूं बहुत दिन हों गए पुष्पा से मिले हुए।
राजेंद्र…पुष्पा से भी मिलेंगे लेकिन उसे पहले हम एक कॉलेज के वार्षिक उत्सव में जायेंगे जहां मुझे मुख्य अथिति के रूप में बुलाया गया हैं।
बेटी से मिलने की बात सुन सुरभि मुस्कुरा दिया पर कहा कुछ नहीं,फिर राजेंद्र बहार आया रघु को साथ ले ऑफिस को चल दिया। जाते हुए राजेंद्र बोला...रघु बेटा अब से तुम बच्चो को पढ़ना बंद कर ऑफिस का का काम संभालोगे।
रघु…जैसा आप कहो।
राजेंद्र…रघु कोई सवाल नहीं सीधा हां कर दिया।
रघु…इसमें सवाल जवाब कैसा अपने कहा था बच्चों को पढ़ाने के लिए तो मैं बच्चों को पढ़ा रहा था। अब आप ऑफिस जानें को कह रहें हैं। तो कुछ सोच समझकर ही कह रहें होंगे।
राजेंद्र...तुम्हें बच्चों को पढ़ाने इसलिए कहा क्योंकि एक ही सवाल बार बार पूछने पर तुम अपना आपा खो देते थे फिर तुम्हें गुस्सा आने लग जाता था। बच्चो को पढ़ाने से तुम अपने गुस्से पर काबू रखना सीख गए हों ओर एक सवाल का कई तरीके से ज़बाब देना भी सीख गए हों। जो आगे चलकर तुम्हारे लिए बहुत फायदेमंद होने वाला हैं।
ऐसे ही बाते करते हुए दोनों ऑफिस पहुंच गए। राजेंद्र ने रघु के लिए अलग से एक ऑफिस रूम तैयार करवाया था। राजेंद्र रघु को लेकर उस रूम में गए और बोला…रघु इसी रूम में बैठकर तुम काम करोगे। जाओ जाकर बैठो मैं भी तो देखू मेरा बेटा इस कुर्सी पर बैठा कैसा दिखता हैं।
रघु कुर्सी पर बैठने से पहले राजेंद्र का पैर छू आर्शीवाद लिया फिर कुर्सी पर बैठ गया। रघु के कुर्सी पर बैठते ही कुछ लोग हाथों में गुलदस्ता लिए आ पहुंचे। उन्हे देख रघु खड़ा हो गया। आने वालो में एक शख्स बाप के उम्र का था। रघु उनके पास जा पैर छुआ फिर बोला... मुंशी काका आप कैसे हैं।?
मुंशी ठीक हूं बोल साथ लाए गुलदस्ता, बधाई देते हुए रघु को दिया फ़िर बारी बारी से मुंशी के साथ आए लोगों ने बधाई के साथ गुलदस्ता भेट कर, चले गए। मुंशी रुका हुआ था सभी के जाते ही मुंशी बोला…मालिक मैं यह काम करने वाला एक नौकर हूं इसलिए मेरा पैर छुना आप'को शोभा नहीं देता।
रघु…भले ही आप यह काम करते हों पर हों तो मेरे दोस्तों के पिता, दोस्त का बाप भी पिता समान होता है। आज के इस शुभ दिन पर मैं कैसे आप का पैर नहीं छूता।
राजेंद्र…बिलकुल सही कहा रघु। अब बता मेरे यार रघु के इस सवाल का क्या जवाब देगा?
मुंशी…राना जी मेरे पास रघु बेटे के सवाल का कोई जबाब नहीं हैं। रघु बेटे ने मुझे निशब्द कर दिया हैं।
रघु मुस्कुराता हुआ जा'कर कुर्सी पर बैठ गया फिर बोला...काका देखिए तो मैं इस कुर्सी पर बैठा कैसा लग रहा हूं। जांच रहा हूं न!
मुंशी...आप इस कुर्सी पर जांच रहे हों। आप'को इस कुर्सी पर बैठा देखकर ऐसा लग रहा हैं जैसे राजा राजसिंहासन पर बैठा हों। बस एक रानी की कमी रह गया
रघु पहले तो शर्मा गया फिर मुस्कुराते हुए बोला...मुंशी काका रानी की कमी लग रहा हैं तो आप मेरे लायक कोई लड़की ढूंढ़ लिजिए ओर मेरी रानी बाना दीजिए।
रघु की बाते सुनकर राजेंद्र और मुंशी मुस्करा दिया फिर राजेंद्र बोला...रघु बेटा कुछ दिन और प्रतीक्षा कर लो फिर तुम्हारे लायक लड़की ढूंढ़ कर रानी बना दुंगा।
मुंशी…हां रघु बेटा राना जी बिल्कुल सही कह रहे हैं। इसी काम में आप'के पापा बड़े जोरों सोरों से लगे पड़े हैं।
राजेंद्र…रघु मेरे साथ चलो तुम्हें कुछ लोगों से मिलवाता हूं।
रघु को ले राजेंद्र ऑफिस में काम करने वाले लोगों से मिलवाने चल दिया। एक एक कर सभी से मिलवाया ओर नाम और पोस्ट के साथ परिचय करवाया। मेल मिलाप कुछ वक्त तक चला फिर राजेंद्र रघु को उसके ऑफिस रूम ले गया ओर बोला...रघु तुम काम करों कहीं भी सहयोग की जरूरत हों तो मुंशी से पुछ लेना।
रघु…जी पापा।
राजेंद्र…रघु मैं तुम्हारे मां के साथ कलकत्ता जा रहा हूं कल तक लौट आऊंगा।
रघु…आप कलकत्ता जा रहे हैं कुछ विशेष काम था।
राजेन्द्र…हां रघु! मुझे एक कॉलेज के वार्षिक उत्सव में मुख्य अथिति के रूप में बुलाया गया हैं।
रघु…ठीक हैं पापा आप आते समय पुष्पा को भी साथ ले'कर आना बहुत दिन हों गए उससे मिले हुए।
राजेंद्र…ठीक हैं अब मैं चलता हूं।
राजेंद्र वह से निकल कर मुंशी के पास गया। मुंशी राजेंद्र को आया देख खडा हों गया। जिससे राजेंद्र उसे फिर से डांटा ओर बोला…मुंशी जैसे तू मेरा सहयोग करता आया हैं वैसे ही अब से रघु का सहयोग करना।
मुंशी…वो तो मैं करूंगा ही लेकिन एक बात समाझ नहीं आया अचानक रघु बेटे के हाथ में ऑफिस का कार्यभार सोफ दिया।
राजेंद्र…दुनियां हमारे सोच के अनुरूप नहीं चलता हैं। मैं भी एक शुभ मूहर्त पर रघु बेटे के हाथ में सारा कार्य भार सोफना चाहता था लेकिन कुछ ऐसी बातें पता चला हैं जिसके चलते मुझे यह फैसला अचानक ही लेना पडा।
मुंशी…बात क्या हैं जो अचानक ऐसा करना पडा।
राजेंद्र…अभी बताने का समय नहीं हैं मैं कलकत्ता जा रहा हूं वह से आने के बाद बता दुंगा।
मुंशी…ठीक हैं।
राजेंद्र मुंशी से मिलकर घर को चल दिया। उधर अपश्यू कॉलेज पहुंचा कॉलेज गेट से एंट्री करते ही गेट पर उसके चार लफंगे दोस्त विभान, संजय, मनीष और अनुराग खडे मिल गए। अपश्यु के चारों दोस्त ऊंचे घराने से थे। चारों में से तीन कुछ ज्यादा ही बिगड़े थे। अपश्यु के साथ रहकर ओर ज्यादा बिगड़ गया लेकिन अनुराग जैसा था वैसा ही रहा। कभी कभी अनुराग सभी दोस्तों का बूरा बरताव देख टोक दिया करता था। जिससे चिड़कार अपश्यु अनुराग को पीट देता था पर अनुराग बुरा नहीं मानता था। इसके पीछे कारण क्या हैं ये अनुराग ही जानता था। चारों को एक साथ देख अपश्यु बोल...अरे ओ लफंगों यह खडे खडे किसको तड़ रहे हों।
विभान…ओ हों सरदार आज आप किस खुशी में आ पधारे।
संजय…सरदार आज क्यों आ गए सीधा पेपर के बाद रिजल्ट लेने आ जाते खामाखा पैरो को तकलीफ दे दिया।
अपश्यु…चुप कर एक तो बड़े पापा ने सुबह सुबह बोल बच्चन सुना दिया अब तुम लोग भी शुरू हों गए।
मनीष…..ओ हों तो राजा जी ने डंडा करके सरदार को कॉलेज भेजा। राजाजी ने अच्छा किया नहीं तो बिना सरदार के गैंग दिशा विहीन होकर किसी ओर दिशा में चल देता।
अनुराग...राजा जी ने अच्छा किया मैं तो कहता हूं राजा जी तुझे रोज डांट कर कॉलेज भेजे इसी बहाने तू कुछ पढाई कर लेगा।
अपश्यु…यार अनुराग तू हमेशा मुझे ही क्यों ज्ञान देता रहता हैं। तू अपना ज्ञान आपने पास रख नहीं तो आज तू प्रिंसिपल से पहले पीट जायेगा। चलो रे मेरे साथ थोड़ा प्रिंसिपल से मुक्का लात किया जाएं।
विभान...आब्बे मुक्का लात नहीं मुलाकात कहते हैं। कम से कम शब्द तो सही बोल लिया कर।
अपश्यु…अरे हों साहित्य के पुजारी मैंने शब्द सही बोला हैं मुझे प्रिंसिपल के साथ मुक्का लात ही करना हैं।
संजय...ओ तो आज फिर से प्रिंसिपल महोदय जी की बिना साबुन पानी के धुलाई होने वाला हैं। निरमा डिटर्जेंट पाउडर कपडे धुले ऐसे जैसे दाग कभी था ही नहीं।
विभान…अरे हों विभीध भारती के सीधा प्रसारण कपडे नहीं धोने हैं प्रिंसिपल जी को धोना हैं। आज की धुलाई के बाद उनकी बॉडी में दाग ही दाग होंगे।
अनुराग...क्या यार तू कॉलेज आते ही मार धड़ करने चल पड़ा। ऐसे तू गुरुओं को पिटता रहेगा तो ज्ञान क्या खाक मिलेगा।
मनीष...ओय ज्ञान चंद अपना ज्ञान का पिटारा अपने पास रख हमारे पास पहले से ही इतना ज्ञान हैं हम ओर बोझ नहीं ढो सकते।
अपश्यु…अरे हों कॉमेडी रंग मंच के भूतिया विलन चल रहे हों या तुम सब की बिना साबुन पानी के झाग निकाल दू।
अनुराग...मैं एक बार फिर से तुझे कहूंगा तू ये सही नहीं कर रहा हैं। हमे टीचर को नहीं मरना चाहिए।
मनीष...अनुराग तू न रोका टोकी न करा कर तुझे कितनी बार कहा है। हमे टोका न कर पर तू हैं की सुनता ही नहीं, चल अपश्यु इसे छोड़ हम चलते हैं।
इतना कह तीनों चल दिया। अनुराग पीछे से आवाज़ देता रहा गया पर वहां सुनने वाला कोई नहीं था। इसलिए निराश हो मन ही मन अनुराग बोला...जीतना इन्हें सुधरना चाहता हूं उतना ही ये बिगड़ते जा रहे हैं। पर कोई बात नहीं मैं एक न एक दिन तुम तीनों में से किसी न किसी को सुधारकर रहूंगा। एक सुधरा तो बाकी बचे भी सुधर जाओगे।
अपश्यु दोस्तों के साथ जा रहा था। प्रिंसिपल के ऑफिस तक जाते जाते जितने भी लड़के लड़कियां रास्ते में मिला सभी को परेशान करते हुए जा रहे थे। लड़के और लड़कियां कुछ कह नहीं पाए सिर्फ दांत पीसते रह गए। कुछ वक्त में अपश्यु प्रिंसिपल जी के ऑफिस के सामने पहुंच गया। ऑफिस के बहार खड़ा चपरासी उन्हे अंदर जानें सो रोक दिया। लेकिन अपश्यु चपरासी को धक्का देकर गिरा दिया फिर ऑफिस मे घूस गया। प्रिंसिपल तीनों को बिना पर्मिशन अंदर आया देख चीड़ गया फिर बोला... अपना तासरीफ लेकर आ गए लेकिन तुम्हें पाता नहीं प्रिंसिपल के ऑफिस में आने से पहले अनुमति मांग जाता हैं।
अपश्यु...तासरीफ इसलिए लेकर आया क्योंकि तेरी तासरीफ की हुलिया बिगड़ने वाला हूं ओर रहीं बात अनुमति कि तो मुझे कहीं भी आने जाने के लिए किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ता।
प्रिंसिपल…लगाता हैं फिर से राजा जी से तुम्हारी शिकायत करना पड़ेगा।
प्रिंसिपल बस इतना ही बोला था ओर अपश्यु जाकर प्रिंसिपल को एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया। थप्पड़ इतना जोरदार था कि प्रिंसिपल अपनी जगह से हिल गया। एक के बाद एक कई थप्पड़ पड़ा फ़िर अनगिनत लात घुसे मारे गए, कुछ ही वक्त में प्रिंसिपल को मार मार कर हुलिया बिगड़ दिया गया। मन भर कर प्रिंसिपल की कुटाई करने के बाद अपश्यु बोला...अब की तूने बड़े पापा से कुछ कहा तो हम भी रहेगें, यह कॉलेज भी रहेगा लेकिन तू नहीं रहेगा। तू इस दुनियां में रहना चाहता हैं तो मेरी बातों को घोल कर पी जा और अपने खून में मिला ले जिससे तुझे हमेशा हमेशा के लिए मेरी बाते याद रह जाएं।
प्रिंसिपल को चेतावनी देकर अपश्यु और उसके दोस्त दनदनाते हुए ऑफिस से निकल गया। प्रिंसिपल की धुलाई कुछ ज्यादा हों गया था इसलिए खुद को संभालने में प्रिंसिपल को थोड़ा समय लगा। खैर खुद को संभालने के बाद चपरासी को बुला लिया ओर उसका सहारा ले डॉक्टर के पास चला गया।
आज के लिए इतना ही आगे की कहानी अगले अपडेट से जानेंगे। यह तक साथ बाने रहने के लिए सभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद।
Sukriya jiSuperb story...but agar roman me hoti toh aur maja aata kyuki devnagri aadhi hi samjhe aati hai.
Bahut bahut shukriyamast update tha bhidu.
meko lagta apasyu ko pehle wale man ki baat maan leni chahiye. dusre wale ki bat mana to dhulayi hogi alag, ghar se nikal diya jayega so alag. to shadi ka function suru ho hi gaya. barat kamla ke ghar pahuche sath mein sankat aur gang bhi ho liye. udhar raman ko apni dil ki rani mil gayi aur sankat ko mauka apasyu ko thokne ke liye. sankat ka ek admi apasyu ko shadi ke mandap se bula ke le bhi gya. dekhte hai age kya hota hai. kya apasyu bach jayega ya maar khayega. bhai ek request hai bhai suhagrat ka scene jarur dikhana.
Bahut bahut shukriyaWonderful update . apsyu is dubhida me fansa tha ke wo parivaar ko apne kiye gaye gunaho ke bare bataye ki nahi. man ki awaaz ne esa karne se mana kar rahi thi use. par dil ki awaaz ne use sahi rasta dikhaya. par sayad batane me deri ho jaye ab kyuki sankat ka admi use saza dene ke liye kisi viran jagah pe le gaya tha, jaha sankat apne admiyo ke sath intejer kar rah tha . ek taraf khushi ka mahol, raghu aur kamla ki shadi ho rahi hai aur dusri taraf apsyu ke sath bahut bura hone wala hai. ese kisike kehne se hi apsyu ko nahi jana chahiye tha.